2013 में भी गिरा था रुपया, तब मनमोहन सरकार ने की थी यह गलती

 नई दिल्ली
रुपया रोज गिर रहा था। हर दिन हेडलाइंस में रुपए की गिरावट छा रही थी। तब सरकार को लगने लगा कि कुछ तो किया जाना चाहिए। बाजार ने रुपये को और वहशी बना दिया था। सरकार की नीतियों पर भरोसा डिगने लगा था। मिला-जुलाकर कुछ ऐसा ही हुआ था 2013 में। 2 जनवरी 2013 को रुपया डॉलर के मुकाबले 54.24 पर था जो 3 सितंबर को 67.635 तक आ गिरा था। 
 
हालात कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के नियंत्रण से बाहर हो गए थे और इस बार भी यही चीजें दोहरा सकती हैं, अगर बीजेपी सरकार स्थितियों को काबू कर पाने में नाकामयाब रही। और हां, बीजेपी सरकार के पास 2018 में नियंत्रण खोने पर बहानेबाजी की गुंजाइश कांग्रेस के मुकाबले बहुत कम होगी। कारण यह है कि इन पांच सालों में आर्थिक आंकड़े बहुत बदल गए हैं… 

डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 72 के पार 

आइए, इन आंकड़ों पर गौर करें… 
1. 2013 में फरवरी से अगस्त के बीच रुपया 23% टूट गया था। 2018 में जनवरी से सितंबर के बीच रुपया 11% टूटा है। 

2. 2013 में वित्तीय घाटा जीडीपी का 4.8% था। 2018 में यह 3.5% के आसपास है। 

3. 2013 में चालू खाता घाटा जीडीपी का 3.4% था। 2018 में घाटे में तेज वृद्धि के बावजूद यह 2% से कम है। 

4. 2013 में फरवरी से अगस्त के बीच कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत औसतन 107 डॉलर प्रति बैरल से कम थी। 2018 में जनवरी से सितंबर के बीच यह औसतन 75 डॉलर प्रति बैरल रही। 

5. 2013 में सितंबर के पहले सप्ताह तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 285 अरब डॉलर था। अभी विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 415 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। 

इन आंकड़ों के मायने क्या हैं? 
2013 में कांग्रेस सरकार को रुपये में अभी के मुकाबले ज्यादा गिरावट देखना पड़ा था। तब अंदरूनी और बाहरी घाटे बहुत ज्यादा थे, कच्चे तेल की कीमतें बहुत ज्यादा थीं और विदेशी मुद्रा भंडार भी कम था। मैक्रोइकनॉमिक्स कहता है कि मौजूदा सरकार अपनी पूर्ववर्ती से बेहतर स्थिति में है। 

इनके अलावा, दो अन्य कारक भी सरकार के पक्ष में काम कर रहे हैं। पहला- इस परिस्थिति में रिजर्व बैंक को स्पष्ट और निश्चित अधिकार मिले हुए हैं। उसका काम खुदरा महंगाई दर को नीचे (करीब 4%) रखना है। इसलिए, रुपया गिरने की स्थिति में आरबीआई से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती है। हां, वह उतार-चढ़ाव को कुछ हद तक काबू करने के लिए छोटे-छोटे कदम जरूर उठाता है। 

दूसरा, 2013 में आर्थिक विकास की रफ्तार घट रही थी, लेकिन 2018 में यह फिर से जोर पकड़ रही है। जब सरकार किसी मैक्रोइकनॉमिक फैक्टर में तेज बदलाव को लेकर कदम उठाना चाहती है तो आर्थिक विकास के मजबूत आंकड़ों से उसे ऐसा करने में आसानी हो जाती है। 

मनमोहन सरकार से कहां हुई थी गलती? 
बाजार की गतिविधियों का अनुमान लगानेवाले शार्क की तरह होते हैं जो समुद्र में एक बूंद खून को भी सूंघ लेते हैं। और, खून तभी बहेगा जब कांग्रेस की तरह बीजेपी भी हर दूसरे दिन स्थितियों पर काबू पाने के कदम उठाने लगेगी। कांग्रेस ने विभिन्न कदमों के साथ-साथ उदार आर्थिक नियमों को पलट दिया था, क्वांटिटेटिव कंट्रोल्स लागू कर दिए थे, अप्रवासी भारतीयों से देश में डॉलर भेजने की गुहार लगाई थी। तब आरबीआई ने नीतिगत ब्याज दरों को 400 बेसिस पॉइंट्स बढ़ा दिया था। इससे रुपये को और धक्का लगा। 

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