Dol Jatra 2022: कब है जाने, महत्व, कहां मनाई जाती है दोल पूर्णिमा

दोल यात्रा (Dol Jatra 2022) या दोल पूर्णिमा (Dol Poornima) के नाम से भी जाना जाता है दोल जात्रा को।

Dol Jatra 2022: का दिन मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक अवकाश का होता है। इस बार डोलीजात्रा 18 फरवरी 2022 को है।पश्चिम बंगाल का एक प्रसिद्ध त्यौहार है दोल जात्रा। जिसे भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम को याद करते हुए मनाया जाता है। दोल जात्रा को बंगाली वर्ष या कैलंडर का अंतिम पर्व भी माना जाता है।

कब है दोल जात्रा (दोल पूर्णिमा) (Doljatra/Dol Purnima)

18 मार्च 2022

दोल जात्रा का महत्व (Doljatra)

भगवान श्री कृष्ण की दोल पूजा की जाती है। दोल जात्रा त्यौहार होली त्यौहार के साथ ही मनाया जाता है। इस दिन लोग श्री कृष्ण जी के चित्र या मूर्ति की पूजा करते हैं और पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम में बहुत ही बड़े तौर पर मनाते हैं। इस दिन श्रीकृष्ण और राधा जी की प्रतिमा को रंगों से सजाया जाता है। बंगाली भाषा में इस सूखे रंग के पाउडर को ‘अबीर’ कहा जाता है। भगवान श्री कृष्ण जी की प्रतिमा को सुन्दर रूप से फूलों से सजाया जाता है। श्री कृष्ण की प्रतिमा या मूर्ति को सुन्दर झूले में बिठा कर फूलों, कपड़ों, पत्तों और रंगीन कागजों से सजा दिया जाता है और जुलुस निकला जाता है जिसे हम दोल जात्रा / दोल यात्रा (ऊङ्म’्नं३१ं / ऊङ्म’ ं३१ं) के नाम से जानते हैं। दोल जात्रा के जुलुस में लोग नाचते हैं, एक दुसरे को रंग लगाते हैं, खूब सारे संगीत और शंख के पवित्र ध्वनि के साथ आगे बढ़ते हैं। रंग के पाउडर को बंगाली में अबीर और ओडिया में फगु कहते है।

कैसे मनाया जाता हैं दोल जात्रा (Doljatra)

दोल पूर्णिमा बंगाली लोगों के लिए और भी महत्वपूर्ण दिन होता है क्योंकि यह दिन चैतन्य माहाप्रभु जी का जन्म दिवस भी होता है। वह एक महान वैष्णव संत थे जिन्होंने आधुनिक संकीर्तन को आगे बढ़ाया और लोकप्रिय बनाया। उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम को अध्यात्मिक रूप से लोगों को समझाया और ज्ञान को आगे बढाया। इस दिन सभी लोग अपने से बड़ों के पैरों में रंग लगा कर उनसे आशीर्वाद लेता हैं। भारत में ज्यादातर राज्यों में इस दिनको छोटी होली के नाम पर मानते हैं और गुलाल खेलते हैं। साधारण रूप से दोल पूर्णिमा या दोल जात्रा एक से दो दिन मनाया जाता है। पर मथुरा और वृन्दावन में दोल यात्रा 16 दिन लगातार मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रथम दिन कृष्ण अपनी पत्नी गुहुंचा के घर जाते हैं। इसमें भक्त गण पालकी में बैठा कर कृष्ण को ले जाते हैं और द्वितीय दिन उन्हें वापस लाते हैं. इस दिन भगवान कृष्ण की मूर्ति को होलिका के चारों और घुमाया जाता है। ज्यादातर राज्यों में इस दिन दूध से बने मिठाइयाँ बने जाती है और लोग अपने सगे-सम्बन्धियों के घर घूमने जाते हैं।

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