यूक्रेन पर हमला: क्या यह ‘नाजीवाद’ और ‘नवनाजीवाद’ की लड़ाई है?

नाजीवाद से दुनिया के देशों को तो खतरा पहले ही से था, अब नवनाजीवाद लोकतांत्रिक चोले में नाजीवाद सिर उठा रहा है।

अजय बोकिल
आज जबकि हम दुनिया में दो महाशक्तियों के वर्चस्व की लड़ाई में एक और हंसते-खेलते देश यूक्रेन को बर्बाद होते देख रहे हैं तथा इस थोपे गए युद्ध का औचित्य तलाशने की कोशिशें कर रहे हैं, तब इस बात की अोर कम ही लोगों का ध्यान गया है कि इस पूरे घटनाक्रम के मूल में नाजीवाद है। मसलन रूस ने यूक्रेन पर हमले को इस आधार पर जायज ठहराया कि पूर्वी यूरोप में नव नाजीवाद के विस्तार को रोकने के लिए यह जरूरी था। दूसरी तरफ अमेरिका और उसके समर्थक पश्चिमी यूरोपीय देश रूस की कार्रवाई का इस बिना पर विरोध कर रहे हैं कि यह रूस की नाजीवादी कार्रवाई है। इसका एक अर्थ यह है कि 21 वीं सदी की पहली चौथाई में राष्ट्रों के बीच वर्चस्व की लड़ाई नव नाजीवाद और नाजीवाद के बीच हो रही है। नाजीवाद से दुनिया के देशों को तो खतरा पहले ही से था, अब नवनाजीवाद लोकतांत्रिक चोले में नाजीवाद सिर उठा रहा है। अब सवाल ये कि बड़ा खतरा कौन सा है? नवनाजीवाद या नाजीवाद अथवा फिर पुतिन जैसे लोकतांत्रिक तानाशाह या फिर चीन जैसे साम्यवादी निरंकुश शासकों का विस्तारवाद? यह प्रश्न इसलिए भी अहम है क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध में सोवियत रूस, अमेरिका और मित्र देशों ने हिटलर के उस नाजीवाद का मिलकर मुकाबला किया, जो नस्ली श्रेष्ठता के दुराग्रह और यहूदियों के खिलाफ नफरत पर आधारित था। लेकिन इसी नाजीवाद की उत्तर कथा यह है कि आज नवनाजीवाद और नाजीवाद ही आपस में भिड़ रहे हैं। रूस यूक्रेन पर कितने दिन में कब्जा कर लेगा या फिर यूक्रेन भी रूस के लिए दूसरा अफगानिस्तान साबित होगा अथवा यह अभी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि इस स्तम्भ के लिखे जाने तक यूक्रेन की राजधानी कीव में रूसी सेनाअोंको तगड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ रहा है। यूक्रेनियाई लोगों में वियतनामियों तथा अफगानियों की तरह लंबे समय तक लड़ते रहने की कूवत और इच्छाशक्ति है, इसके संकेत मिलने लगे हैं। उसे नाटो देशों से हथियार भी‍ मिलने लगे हैं। यूक्रेन के इस प्रतिरोध ने रूस की परेशानी बढ़ा दी है। शायद इसीलिए पुतिन एक तरफ परमाणु बम डालने की धमकी और दूसरी तरफ यूक्रेन से बातचीत का प्रस्ताव भी दे रहे हैं। जाहिर है कि युद्ध लंबा खिंचा तो रूस में कल तक हीरो समझे जाने वाले पुतिन विलेन भी बन सकते हैं।

इस पर गहन विमर्श के पहले यह जान लें कि नवनाजीवाद और नाजीवाद क्या है, दोनो में फर्क क्या है और आज की दुनिया में सौ साल पहले जन्मे नाजीवाद के पुनरूत्थान के क्या मायने हैं? पहले नाजीवाद की बात। नाजीवाद का जन्म तानाशाह एडाॅल्फ हिटलर के जमाने में जर्मनी में हुआ। दरअसल ‘नाजी’ शब्द जर्मन भाषा के शब्द ‘नेशनलसोजियालिस्मस’ ( अंग्रेजी में नेशनल सोशलिस्ट यानी राष्ट्रीय समाजवाद) का संक्षिप्त रूप है। हालांकि इस समाजवाद का उस समाजवाद से खास सम्बन्ध नहीं है, जो हम पढ़ते आए हैं। ‘राष्ट्रीय समाजवाद’ की यह थ्योरी पहले से चले आ रहे आर्थिक सामाजिक समता पर आधारित समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद और वैश्विक अंतरराष्ट्रवाद के विचार का तिरस्कार करने वाली और अति राष्ट्रवाद का पुरस्कार करने वाली थी, जो प्रथम विश्वयुद्ध में हार के बाद जर्मनी को दी गई सजा और इटली में फासीवाद के उभार के परिणामस्वरूप जन्मी थी। जर्मनी में हिटलर ने ही 1919 में नाजी पार्टी की स्थापना की थी। 1933 में जर्मनी की सत्ता नाजी पार्टी के हाथ में आ गई। नाजीवाद की बुनियाद में जर्मन जाति को दुनिया की श्रेष्ठतम नस्ल मानना और यहूदियों के प्रति भयंकर घृणा, क्रूर राष्ट्रवाद और घनघोर सैन्यवाद शामिल था। हिटलर जर्मनो को आर्य (श्रेष्ठ) जाति मानता था ( हालांकि इस ‘आर्य’ का उन भारतीयों से कोई सम्बन्ध नहीं था, जो खुद को आर्यों की संतान मानते हैं)। हिटलर ने हमारे शुभ चिन्ह ‘स्वस्तिक’ को अपना प्रतीक बनाया था। नाजीवाद वास्तव में उग्र राष्ट्रवाद, जन अपील और तानाशाही शासन का पैरोकार था। एक ऐसा आंदोलन, जिसमें बुद्धिजीवियों और दूसरे किसी विचार की कोई जगह नहीं थी। केवल एकांगी विचार, एक नस्ल और एक तंत्र में इसका भरोसा था। नाजीवाद चमत्कारिक नेतृत्व पर अंधा भरोसा करता था, जो कि हिटलर था। दुष्प्रचार नाजीवाद का एक प्रमुख हथियार था। दरअसल नाजीवाद भी प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इटली में जन्मे फासीवादी‍ विचार का विस्तार था। ‘फासी’ इतालवी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘ लकड़ी/लाठी का गट्ठा। दूसरे शब्दों में कोई एक एकसत्ताचलित राजनीतिक संगठन। फासीवाद का भरोसा सर्वसत्तावाद और अधिनायकवाद में रहा है। यानी एक शक्तिशाली निरंकुश केन्द्रीय सत्ता ही सब कुछ है। एक भाषा, एक भूषा, एक तंत्र, एक शैली और एक सोच इसका आधार था। इस सर्वसत्तावाद में व्यक्ति स्वातंत्र्य या असहमति की कोई जगह नहीं थी। सत्ता के खिलाफ बोलने का ‍अधिकार किसी को नहीं था। ये प्रवृत्ति आज भी कई देशों में सिर उठा रही है, लेकिन उसका स्वरूप थोड़ा बदला हुआ है। लोकतांत्रिक देशों में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है तो साम्यवाद सत्ताअो ने भी आगे चलकर खुद को मजबूत करने इसी को हथियार बनाया, जैसा कि हम चीन और उत्तर कोरिया में देख रहे हैं और दक्षिणपंथी सोच का तो आदर्श यही है। फासीवाद और नाजीवाद में फर्क केवल इतना है कि फासीवाद एक केन्द्रीय शक्ति में भरोसा रखता है तो नाजीवाद इसी के साथ नस्लीय श्रेष्ठता का भी पैरोकार है। अलबत्ता दोनो ही लोकतंत्र और उदारवाद के विरोधी तथा हिंसा को महिमा मंडित करते हैं।

खुद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन इसी नाजी/फासी विचार से इत्तफाक रखते हैं। कहा जाता है कि इस अर्थ में वो उस पुराने सोवियत रूस को जिंदा करना चाहते हैं, जो अब साम्यवादी न होकर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भले पूंजीवादी हो, लेकिन भू-राजनीतिक दृष्टि से क्रूर राष्ट्रवादी हो। जिसके लिए रूस के हित और तानाशाही सर्वोपरि हों। इसके लिए पड़ोसी देश को कुचलना भी पड़े तो गैर नहीं। एक महाशक्ति की आकांक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो पुतिन वही कर रहे हैं, जो रूस के सैनिक और राजनैतिक प्रभा मंडल को बचाने के लिए जरूरी है। अमेरिका और उसके मित्र देशों के संगठन ( इनमें ज्यादातर लोकतांत्रिक पूंजीवादी देश हैं) नाटो को रूसी प्रभाव क्षेत्र से किसी भी कीमत पर दूर रखना है। उन्हें आशंका है किन नाटो के बढ़ते कदम रूस की ताकत को बेहद कमजोर कर देंगे। कहा जा रहा है कि पुतिन का असल इरादा यूक्रेन के रूप में एक बफर स्टेट खड़ी करना है, जो नाटो और रूस के बीच एक सुरक्षित दीवार के रूप में हो। ताकि दोनो का सीधा मुकाबला न हो। इसके लिए वो किसी भी सीमा तक जाने और कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं। हालांकि खुद रूस में भी पुतिन का विरोध हो रहा है, लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि पुतिन ने यूक्रेन में अपनी सैनिक कार्रवाई को अमेरिका और पश्चिमी देशों में उभर रहे उस ‘नवनाजीवाद को कुचलने’ की कार्रवाई बताया है, जो अब यूक्रेन में भी घुस रहा है। गहराई से देखें तो अमेरिका जिसे रूसी नाजीवाद मानता है, वहीं रूस अमेरिका व अन्य देशों में उभर रहे उग्र राष्ट्रवाद व वैश्विक रंगदारी को ‘नवनाजीवाद’ बताता है और इसे अपने राष्ट्रवाद व रंगदारी के लिए गंभीर खतरा मानता है।

दरअसल 20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी और धुरी राष्ट्रों की हार के बाद नाजीवाद का उभार नए रूप में हुआ। यह नाजीवाद का नया वैश्विक रूप है, जिसमें श्वेत नस्ल की सर्वश्रेष्ठता के साथ साथ यहूदी विरोध, इस्लामोफोबिया ( इस्लाम को लेकर भय) और अलग अलग देशों में अल्पसंख्यको के प्रति नफरत भी शिद्दत से जुड़ गई है। नाजीवाद के राजनीतिक विचार को नवनाजीवाद अब इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत तेजी से फैल रहा है। खासकर विश्व में इस्लामिक आतंकवाद के उभार के बाद प्रतिक्रियास्वरूप भी यह तेजी से फैला है। रूस भी देश के चेचन्या प्रांत में इस्लामिक आतंकवाद से जूझ रहा है। साथ ही वह सोवियत रूस के समय वाली अपनी महाशक्ति के खुमार को भी भुला नहीं पा रहा है। पुतिन उसे फिर से जिंदा करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। हो सकता है यूक्रेन प्रकरण के बाद वो नाटो के खिलाफ पुरानी वारसा संधि संगठन जैसा कोई प्रयास फिर करें। पुतिन चाहते हैं कि नवनाजीवाद के रूप में अमेरिका की मानवाधिकार समर्थक हवा रूस में प्रवेश न करे। हालांकि जिस तरीके से पुतिन यह सब कर रहे हैं, उन्हें इसका जवाब देना ही होगा।

तो क्या यूक्रेन प्रकरण वास्तव में नाजीवाद और नवनाजीवाद की लड़ाई है या फिर यह क्रूर राष्ट्रवाद और उदार राष्ट्रवाद का संघर्ष है? कीव का पतन हो न हो, लेकिन यूक्रेन अब एक शांत देश नहीं रहेगा, यह तय है। रूस और अमेरिका एक दूसरे पर नाजीवादी होने के आरोप भले लगाते रहें, लेकिन हकीकत में दोनो की मंशा एक ही है और वो है, अपना चिमटा गाड़ना। अब चीन भी इस दौड़ में शामिल हो गया है, लेकिन अभी उसका अमेरिका या रूस जैसा कोई भू-राजनीतिक, सैनिक आभामंडल नहीं है। वो यह काम अपनी आर्थिक महाशक्ति होने के दम पर कर रहा है। इस महासंघर्ष में छोटे देशों की तो कोई औकात ही नहीं है, भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश की भूमिका भी बेबसी की ज्यादा है। हम चीन के विस्तारवाद का तो विरोध कर रहे हैं, लेकिन रूसी विस्तारवाद पर इसलिए खामोश हैं, क्योंकि रूस हमारा आजमाया दोस्त है। हम अमेरिका के विस्तारवाद पर भी दबी जबान में बोलते हैं, क्योंकि हमे चीन से निपटने बड़ा कंधा चाहिए।

अब सवाल ये कि ‘नाजीवाद’ और ‘नवनाजीवाद’ में फर्क क्या है? यह नाजीवाद का ही यह नया रूप है? सिर्फ जुमलेबाजी है या फिर दुनिया की चौधराहट के आकांक्षी मुल्कों का बाकी विश्व की नजर में धूल झोंकना है? शांति, ‍अहिंसा और मानवता के सबक केवल कमजोर देशों के लिए हैं। दुनिया को चलाने का ठेका चंद मुल्कों के पास ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो लड़ाई केवल ‘मेरा लट्ठ तेरे लट्ठ से ज्यादा बड़ा’ की है। यह बेशर्म दादागिरी है। इसमें मानवीय संवेदनाअों, सम्प्रभुता के सम्मान और परस्पर साहचर्य, और संवाद की कोई खास जगह नहीं है? यह प्रवृत्ति विश्व के बेहद डरावने भविष्य का संकेत है।
वरिष्ठ संपादक
‘राइट क्लिक’ ( ‘सुबह सवेरे’ में दि. 28 फरवरी 2022 को प्रकाशित)

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