नींबू को लगी महंगाई की नजर और उम्मीद का टोटका…

आम तौर पर चिलचिलाती गर्मी में भी रूपए-दो रूपए का मिलने वाला नींबू इस बार 10 रू. में एक भी मुश्किल से मिल रहा है और किलो के हिसाब से तो भाव 4 सौ रू. को पार कर गया है।

अजय बोकिल
अमूमन बुरी नजर से बचाने वाले नींबू को ही इस बार जब महंगाई की बुरी नजर लग गई तो इसका उतारा क्या है? दांतो पर नींबू रगड़ने वाले भी परेशान है कि गुलाब जामुन के भाव बिकने वाले नींबू का क्या करें? आम तौर पर चिलचिलाती गर्मी में भी रूपए-दो रूपए का मिलने वाला नींबू इस बार 10 रू. में एक भी मुश्किल से मिल रहा है और किलो के हिसाब से तो भाव 4 सौ रू. को पार कर गया है। बड़ी मुसीबत को गर्मी में नींबू पानी बेचकर खुद का पेट पालने वालों की है। वो किसी तरह एक नींबू में चार ग्लास बनाकर रोजी का जुगाड़ कर रहे हैं। गोया नींबू ने उन्हें ही निचोड़ लिया है।

हमारे यहां नींबू एक ऐसा फल है, जो रसोई से लेकर औषधि तक और खेल से लेकर तांत्रिक टोटकों तक समान रूप से इस्तेमाल होता है। नींबू का अचार तो हर भारतीय के के खाने का हिस्सा है ही, साथ में घरेलू उपचार का भी जरूरी भाग है। खुद में साइट्रिक एसिड रखने वाला नींबू अम्लता को हरता है। नींबू पानी लू से राहत देता है। वो सलाद के साथ जरूरी है तो खेलों में नींबू वो बिरला फल है, जो मुंह में चम्मच पर नींबू रखकर होने वाली दौड़ में काम आता है। यूं नींबू सर्व सुलभ रसीला फल है। लोग उसे निचोड़कर फेंक देते हैं। रसीले और खट्टे नींबू की जिंदगी इतनी ही होती है। कुछ लोग नींबू के छिलकों को सुखाकर उसका इस्तेमाल भी औषधीय रूप में करते हैं। नींबू को आयुर्वेद में भी अम्लता नष्ट करने वाला पाचक फल माना गया है। खास बात यह है कि नींबू शुद्ध रूप से भारतीय फल है और भारत में ही सबसे ज्यादा होता तथा खाया भी जाता है। कहते हैं कि इसे सबसे पहले असम में उगाया गया। लेकिन अब यह सबसे ज्यादा आंध्र प्रदेश और गुजरात में पैदा होता है। नींबू पैदावार के मामले में मध्यप्रदेश का देश में नंबर पांचवां है। भारत में नींबू की सर्वाधिक खपत है और पैदावार भी बहुत है। सालाना भारत में 37 लाख टन से ज्यादा नींबू का उत्पादन होता है। हम न तो नींबू का आयात करते हैं और न ही निर्यात। इस अर्थ मे नींबू हकीकत में ‘आत्मनिर्भर’ भारत का प्रतीक फल है।

हमारे देश में मुख्य रूप से दो किस्म का नींब पैदा होता है। लेमन और लाइम। छोटा, गोल और पतले छिलके वाला कागजी नींबू सबसे ज्यादा मिलता है। अचार के लिए इसीका इस्तेमाल होता है। लाइम श्रेणी में गहरे हरे रंग के नींबू आते हैं, जो ज्यादातर ( गन्ने के रस की) मधुशालाअों और जलजीरे के ठेलों पर दिखते हैं। किसानी भाषा में नींबू की फसल ‘बहार’ कहलाती है। बेहतर पैदावार के लिए नींबू के पेड़ों पर किया रासायनिक छिड़काव ‘बहार ट्रीटमेंट’ कहलाता है। नींबू की साल में तीन फसलें आती हैं, इसलिए नींबू लगाना फायदे का सौदा है। ये तीन ‘बहारे’ हैं अंबे, मृग और हस्त। हालांकि मोटे तौर पर नींबू के कुल उत्पादन का 60 फीसदी अप्रैल के महीने में आता है, जो इस बार नहीं आया। यही अंबे बहार कहलाती है। कारण कि बेमौसम बारिश और तेज गर्मी क चलते नींबू के फूल फरवरी में ही झड़ गए। फल बन ही नहीं पाया। अंबे के पहले वाला हस्त बहार भी पिछले साल ठीक नहीं था। दो बहार फसल के लिहाज में खिजां में बदलने से जिंदगी नींबू विहीन सी लगने लगी। अक्सर गर्मियो में जो नींबू बाजार में दिखता है, वो कोल्ड स्टोरेज का ही होता है। यही नींबू दो बहारों के गैप को भर देता है। अब आलम यह है कि नींबू का टोटा है और भाव आसमान छू रहे हैं। कहा जा रहा है कि आने वाली फसल ठीक रही तो नींबू फिर अपनी रौ में आ जाएगा।

बहरहाल इस साल नींबू की दुर्लभता ने उसकी अहमियत का अहसास तो करा ही दिया है। उधर टोटकेबाज और तांत्रिक भी परेशान है कि मुआ नींबू तक आसानी से नहीं ‍िमल रहा। कहते हैं ‍कि नींबू से वशीकरण बहुत आसान होता है। आप शत्रु को तुरंत भगा सकते हैं। लेकिन अगर यही आपदा नींबू पर आन पड़े तो उसका कोई तोड़ नहीं है।

इस बीच शहर के मुख्य बाजारो में अल सुबह नजर फेरी तो पता चला कि नींबू मिर्च के पारंपरिक टोटके में भी नींबू का आकार और छोटा हो गया है। रोजाना तो वह मिल भी नहीं रहा। ऐसे में टोटकेबाजों ने मिर्च की मात्रा बढ़ा दी है। बड़े शहरों में दुकानों पर नींबू मिर्च का टोटका टांगना भी एक व्यवसाय है। टोटका टांगने वाला सुबह ही पुराने टोटके को हटाकर नया टोटका लटका देता है। धंधे वालों का मानना है कि ये टोटका लटकाने से लक्ष्मी आती है और लक्ष्मी की बहन दरिद्रा ( अलक्ष्मी) दूर रहती है। कहते हैं कि दरिद्रा को खट्टा और तीखा पसंद है। इसीलिए वो नींबू और मिर्ची पर हाथ मारती है और तृप्त होकर लौट जाती है। कुछ लोग तो कार में नींबू मिर्च का टोटका टांग कर चलते हैं। मानकर कि इससे एक्सीडेंट नहीं होगा। कुछ तांत्रिक नजर उतारने के लिए भी नींबू का इस्तेमाल करते हैं। तं‍त्र क्रिया के लिए नींबू काटने और उसे दिशावार फेंकने का भी एक शास्त्र है। लेकिन भड़क गुलाल के साथ कटा नींबू डरावनी शक्ल ले लेता है, इसमें शक नहीं।

नींबू हमारे जीवन में किस गहराई से शामिल है, यह नींबू पर बनी कहावतों से समझा जा सकता है, जो हमारे सदियों के सामूहिक अनुभव से उपजी हैं। नींबू मोटापा रोकने में सक्षम है। मितली आने पर भी नींबू ही मदद करता है। इसी तरह एसिडिटी होने पर नींबू- पानी लेने के लिए किसी चिकित्सक के पास जाने की जरूरत नहीं है। एक दोहा है-‘आधा नींबू काटिए सेंधा नमक मिलाय, भोजन प्रथमहि चूसिए सौ अजीर्ण मिट जाए।‘ नींबू ताकतवर फल भी है। इसीलिए कहा जाता है कि ‘एक नींबू मनो दूध को भी फाड़ देता है।‘ छेना तो नींबू की बदौलत ही बनता है। मुकाबले मे ‍िकसी को बुरी तरह हराने के लिए कहा जाता है- निंबुआ नोन चटा दिया। नींबू का रिश्ता मूंछों की शान से भी है। मसलन मूंछों पर नींबू टकने का अर्थ है शान से मूंछे मरोड़ना। किसी को जलील करने का मतलब है ‘नाक काट के नींबू निचोड़ना।‘ और तो और धंधे में घाटे के लिए भी बुजुर्गों ने नींबू का सहारा लिया यानी ‘आम की कमाई, नींबू में गंवाई।‘ फिलहाल जब तक नींबू की अगली फसल न आ जाए ‍िदल में उम्मीद का टोटका टांगे रखिए…!

लेखक : वरिष्ठ संपादक
‘राइट क्लिक’ ( ‘सुबह सवेरे’ में ‍दि. 19 अप्रैल 2022 को प्रकाशित)

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