भारतीय मिठाइयों की रोचक कहानियां

भारत में मिठाइयां सामाजिक, धार्मिक और सांसकृतिक परिवेश का एक अनिवार्य हिस्सा है, यहां कोई भी उत्सव पारंपरिक मिठाइयों के बिना अधूरा माना जाता है। यहां तक कि यहां सभी देवी-देवताओं की पसंदीदा मिठाइयां हैं। जैसे गणेश जी को मोदक से प्रेम है, हनुमान जी को लड्डू, भगवान शिव को ठंडाई और श्री कृष्णा को पेड़े पसंद हैं। इनमें से कुछ मिठाइयों का इतिहास सैकड़ों सालों से भी पुराना है जिनसे कई दिलचस्प कहानियां भी जुड़ी हुई हैं।

गुलाब जामुन
मुलायम और रसीला यह दोनों शब्द गुलाब जामुन को बखूबी बयां करते हैं। गुलाब जामुन खास मौकों और त्योहारों पर इस्तेमाल की जाने वाली मशहूर मिठाइयों में से एक है। लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि भारत में चाव से खाई जाने वाली यह मिठाई असल में इस देश की है ही नहीं. असल में यह मिठाई पर्शिया (वर्तमान में ईरान) से आई है. इसकी उत्पत्ती अरबी डिजर्ट लुकमत-ए-काधी से मानी जाती है। इस मिठाई ने मुगल काल में प्रसिद्धि प्राप्त की और बाद में इसका नाम गुलाब जामुन पड़ा, जिसका पर्शियन में अर्थ गुल (फूल), अब(पानी)। इसका आकार भारतीय फल जामुन जैसा होता है इसलिए गुल और अब के साथ जामुन भी जुड़ गया।

रसगुल्ला
यह नरम और रसीली मिठाई पूरे विश्व में बंगाली मिठाई के तौर पर मशहूर है। कोई भी त्यौहार या समारोह इसकी गैरमौजूदगी में संभव नहीं है। यह छेना या घर पर बने चीज से बनाया जाता है, इसका असली नाम खीरा मोहाना है और ऐसा कहा जाता है कि इसकी शुरुआत ओडीशा में हुई है। दंत कथाओं की मानें तो यह मिठाई सदियों पुरानी है और यह देवी-देवताओं की पसंदीदा मिठाइयों में से एक है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार भगवान जगन्नाथ रथयात्रा पर जा रहे थे, लेकिन अपने साथ अपनी पत्नी लक्ष्मी को नहीं ले गए, जिससे वह उदास हो गईं। उन्हें मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ ने उन्हें रसगुल्ला खिलाया। तब से आजतक देवी लक्ष्मी को खुश करने के लिए रथ यात्रा के नौवें दिन रसगुल्ले का भोग लगाया जाता है।

लड्डू
चाहे मोतीचूर का लड्डू हो, बूंदी का या बेसन का, यह स्वीट डिश ऐसी है जो आराम से घर पर बनाई जा सकती है। त्योहारों और खास मौकों पर लड्डू जरूर बनाए जाते हैं और इनका भी अपना इतिहास है। यह सुनकर हैरानी हो सकती है कि पहले लड्डू बढ़ती हुई लड़कियों को उनके हार्मोन्स संतुलित करने के लिए दिए जाते थे। स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाने के लिए ही आज भी गोंद का लड्डू, सोंठ का लड्डू और पंजीरी का लड्डू गर्भवती महिलाओं को खाने के लिए दिया जाता है।

संदेश
संदेश बंगाल की मिठाई के तौर पर मशहूर है और इसे छेने से बनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह छेना पुर्तगाल से भारत में लाया गया। संदेश बंगाल में मशहूर रसगुल्ले के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही आ चुका था। शायद यही वजह है कि यह बंगालियों को प्रिय है। कलकत्ता में पहले के जमाने में छेने को चीनी के साथ मिला दिया जाता था ताकि वह बर्बाद न हो। यह संदेश मिठाई का पहले रूप था, इसके बाद से यह मिठाई बदलती गई और बंगालियों के कल्चर का एक हिस्सा बन गई।

जलेबी
जब गरमागरम जलेबी और ठंडी रबड़ी को साथ खाया जाता है तो बस क्या कहना। जलेबी भारत में बरसों से खाई जा रही है लेकिन आपको बता दें कि यह भारतीय डिजर्ट है ही नहीं। ऑक्सफर्ड कम्पैनियन के अनुसार एक बगदादी लेखक की कुकबुक ‘किताब-अल-ताबीख’ में जलेबी की पूरी रेसिपी दी गई है, जहां इसके अलग-अलग नाम हैं। जलेबी भले ही भारतीय डिश न हो लेकिन इसे यहां करीब 500 सालों से खाया जा रहा है। जलेबी नाम संस्कृत शब्द ‘जलवल्लिका’ से आया है जिलका अर्थ होता है ‘जल से भरपूर’। आपको जानकर आश्चर्य होगा लेकिन उत्तरी भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में सिरदर्द और सर्दी से राहत पाने के लिए जलेबी को गर्म दूध के साथ खाया जाता है।

आगरा का पेठा
कोई ताजमहल जाए और पेठे के बगैर लौट आए ऐसा कभी नहीं हो सकता। इन पेठों का स्वाद लाजवाब होता है, पर क्या आपको पता है कि इसकी शुरुआत मुगल साम्राज्य की शाही रसोई से हुई है। सम्राट शाहजहां ने यह हुक्म दिया था कि ऐसी मिठाई बनाई जाए जो ताजमहल की ही तरह सफेद हो फिर क्या था 500 कर्मचारियों को पेठा बनाने के लिए नियुक्त किया गया। यह भी माना जाता है कि पेठा भी उतना ही पुराना है, जितना की ताजमहल। इसे ईश्वर की मिठाई भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह दुनिया की सबसे पुरानी मिठाई है जो केवल कद्दू, चीनी और पानी को मिलाकर बनाया जाता है।

मैसूर पाक
बेसन, घी और चीनी को मिलाकर बनाई जाने वाली यह मिठाई 17वीं या 18वीं सदी से ही बनाई जा रही है। यह साउथ इंडियन स्वीट डिश त्योहारों के साथ ही रोजाना के दिनों में भी बड़े चाव से खाई जाती है। कहा जाता है कि मैसूर के राजा कृष्णा राजा के साम्राज्य के सबसे बड़े बावर्ची काकासुर मडप्पा ने पहली बार मैसूर पाक बनाया था। कहानी के मुताबिक, राजा कृष्णा राजा को खाना परोसा जाता है लेकिन थाली में एक जगह खाली बची देख मडप्पा तुरंत बेसन, घी और चीनी मिलाकर मिठाई बना देते हैं। मडप्पा राजा को यह मिठाई देते हैं तो उन्हें वह बहुत पसंद आती है। राजा और मिठाई मांगते हुए इसका नाम पूछते हैं तो मडप्पा घबरा जाते हैं और मिठाई का नाम मैसूर पाक बताते हैं।

शाही टुकड़ा
शाही टुकड़ा मुगलाई व्यंजन का हिस्सा है। इसे मुगल साम्राज्य में ही पहली बार बनाया गया था। इसके पीछे की कहानी बहुत दिलचस्प है। एक बार एक राजा अपनी सेना के साथ शिकार के लिए जाते हैं और वह नील नदी के पास कुछ खाने के लिए रुकते हैं। यह सुनकर गांव के लोग बहुत उत्साहित होते हैं और स्थानीय बावर्ची उम्म अली के पास जाते हैं ताकि वह राजा और उनकी सेना के लिए कुछ खास बनाए। ग्रामीणों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे, ऐसे में बावर्ची कुछ बासी ब्रेड लेता है और उसे नट्स, क्रीम, चीनी और दूध से बनी ग्रेवी में डाल देता है। राजा और उनकी सेना को यह डिजर्ट बहुत पसंद आया। चूंकि इसे राजा और शाही सेना के लिए बनाया गया था इसलिए तभी से इसे शाही टुकड़ा कहा जाता है।

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