बच्चों को उम्र से पहले बड़ा बनाता है पारिवारिक तनाव

प्रिया के माता-पिता की लव मैरिज थी। परिवार वालों ने दोनों को छोड़ दिया। अलग-थलग पड़े प्रिया के माता-पिता का रिश्ता भी धीरे-धीरे खराब होता गया। घर में झगड़े, फिर मारपीट होने लगी। रोज-रोज के झगड़ों और मारपीट ने प्रिया को उम्र से पहले ही परिपक्व बना दिया।

वह अपनी उम्र के दूसरे बच्चों से ज्यादा गंभीर हो गई। उसका बचपना खत्म हो गया। वह वयस्कों जैसे सोचने-समझने लगी। भारतीय परिवारों में तनाव का बच्चों पर पड़ने वाले असर पर शोध करने वाली यूनिवर्सिटी आॅफ हर्टफोर्डशायर की सना अहसान कहती हैं- यह ठीक नहीं है।

यह बच्चों को मानसिक तौर पर बीमार बनाता है। बड़े होकर वे बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसआॅर्डर का शिकार हो जाते हैं। उनमें ऐसा व्यक्तित्व विकसित होता है, जिसके कारण वे खुद को महत्व नहीं दे पाते। वे बड़े होकर अपने संबंधों में हिंसा और शोषण का शिकार होते हैं, फिर चाहे वे दोस्त हों, सहकर्मी या फिर जीवनसाथी। उनमें आत्मविश्वास की भी हमेशा कमी रहती है। ऐसे परिवारों के बच्चे जहन में बिठा लेते हैं कि उनकी खुद की मदद के लिए कोई नहीं है। यहां तक कि उन्हें ही परिवार की जिम्मेदारी उठानी है। फिर चाहे वे घरेलू कामकाज हों, पड़ोसियों-रिश्तेदारों से संबंध या फिर अपने छोटे भाई-बहनों का ध्यान रखना। वे परिवार का माहौल ठीक रखने के लिए अपने माता-पिता का ध्यान रखने की कोशिश करते हैं। बावजूद इसके परिवार में बढ़ते लड़ाई-झगड़ों के लिए वे खुद को कसूरवार समझने लगते हैं।

खुद को दोष देते हैं बच्चे
प्रिया बताती हैं- उन्हें पता चल जाता था किसको कब क्या चाहिए। ऐसा लगता था जैसे दिमाग में भावनात्मक रडार लग गया हो। प्रिया ऐसी अकेली नहीं है। मीरा, अनहता, साधिका की भी लगभग यही कहानी है। दरअसल भारत के उन परिवारों में जहां माता-पिता के बीच लगातार तनाव का माहौल रहता है, बच्चे चाहे-अनचाहे उस दूरी को भरने की कोशिश करते हैं और ऐसा न कर पाने पर खुद को दोष देने लगते हैं। ऐसे माहौल में वे अपनी परेशानियां या जरूरतें किसी को बता नहीं पाते। अगर बताया तो निराशा और गुस्से भरा माहौल मिलता है। इससे उन्हें डर लगने लगता है और शर्मिंदगी का एहसास होता है। बाल रोग विशेषज्ञ और मनोविश्लेषक डोनाल्ड विन्नीकॉट ने इसके लिए ह्यफाल्स सेल्फह्ण टर्म दिया है। उनका कहना है कि ऐसे बच्चे जो तनाव भरे पारिवारिक माहौल की वजह से एक तरह की पेरेंटिंग करने लगते हैं। बड़े होने के बाद भी अपनी इच्छाएं और जरूरतों को अनदेखा करते हैं। वे मन ही मन चाहते हैं कि कोई बिना कहे ही उनकी भावनाएं समझ ले।

ऐसे बच्चे डॉक्टर, शिक्षक, कोच जैसे पेशों में बेहतर
ऐसे वयस्क, जिनका बचपन पारिवारिक तनाव भरे माहौल में गुजरा है, वे उन पेशों में दूसरों से ज्यादा बेहतर होते हैं जिनमें संवेदनशील होने की ज्यादा जरूरत होती है। ऐसे लोग संवेदनशील होने के साथ-साथ बहुत देखभाल करने वाले और समस्या का निदान करने वाले होते हैं। जैसे पेरेंटिंग कोच, थेरेपिस्ट, डॉक्टर, नर्स, शिक्षक जैसे पेशों में यह बेहतर करते हैं।

 

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