‘हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सर्वे में एट्रोसिटी एक्‍ट के 75 फीसदी मामले झूठे’

जबलपुर
एट्रोसिटी एक्ट को लेकर सवर्ण समाज और सपाक्स से घिरी प्रदेश सरकार अब अधिवक्ताओं के भी निशाने पर आ चुकी है. एट्रोसिटी एक्ट को लेकर हाल ही में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने तीनों खण्डपीठों और जिला न्यायालयों में एक सर्वे भी कराया, जो इस एक्ट की हकीकत को बताता है. सर्वे के अनुसार प्रदेश में एट्रोसिटी एक्ट के तहत दर्ज 75 प्रतिशत मामले झूठे हैं. इनमें भी पिछड़े वर्ग के लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या 80 प्रतिशत है.

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसएिशन प्रदेशभर के अधिवक्ताओं का मूल संगठन माना जाता है, जिसके दायरे में प्रदेश का हर एक अधिवक्ता आता है. एसोसिएशन के अध्यक्ष आदर्शमुनि त्रिवेदी के मुताबिक एक अधिवक्ता 100 लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. सरकार ने जिस तरीके से एट्रोसिटी एक्ट को लागू किया है, उसका परिणाम समाज के सामने है.

उन्‍होंने कहा कि कोई भी अधिवक्ता एसटी-एससी एक्ट के खिलाफ नहीं है, लेकिन संशोधन के बाद उसके जो परिणाम सामने आए हैं, उससे समाज का एक बड़ा तबका प्रभावित हो गया है. त्रिवेदी के मुताबिक हाल ही में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर हाईकोर्ट और जिला न्‍यायालयों में कराए गए सर्वे में ये स्पष्ट हुआ है कि प्रदेश में एट्रोसिटी एक्ट के तहत दर्ज 75 प्रतिशत मामले झूठे हैं. इनमें भी पिछड़ा वर्ग के लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या 80 प्रतिशत है.

त्रिवेदी का कहना है कि वे मुख्यमंत्री को सड़कों पर काले झंडे दिखाने में विश्‍वास नहीं रखते हैं, लेकिन सरकार ने अगर जल्‍द ही एट्रोसिटी एक्ट के दुष्परिणामों को दूर करने के लिए कदम नहीं उठाए तो उसे इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है.

 

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