कई कालोनियां हाईटेंशन लाइन के नीचे ही बसी

देहरादून
हाईटेंशन लाइन का करंट किसी व्यक्ति को 20 फीट की दूरी से भी खींच सकता है। बावजूद इसके राजधानी देहरादून में तमाम घर मौत के इस मुहाने से महज पांच से 10 फीट की दूरी पर बने हैं। कई कालोनियां तो हाईटेंशन लाइन के नीचे ही बसी हुई हैं। इस बसावट के लिए यहां रह रहे नागरिकों के बराबर ही जिम्मेदार सरकारी तंत्र की हीलाहवाली भी है। बनियावाला में बीते दिनों हाईटेंशन लाइन के करंट की चपेट में आकर हुई जुड़वा भाइयों की मौत इसी हीलाहवाली का दुष्परिणाम है। यह बात सही है कि कालोनियों की बसावट हाईटेंशन लाइन की स्थापना के वर्षों बाद हुई। लेकिन, सवाल यह है कि इस बसावट को रोकने या स्थानांतरित कराने को जिम्मेदारों ने क्या प्रयास किए। ऐसे मामलों में कार्रवाई नोटिस भेजने तक ही सीमित क्यों है? आमजन को भी चाहिए कि सस्ती जमीन के लालच में जान का खतरा कतई मोल न लें।

लापरवाही के पहियों पर रोडवेज
उत्तराखंड परिवहन निगम के अधिकारियों-कर्मचारियों के भी क्या कहने। निगम की माली हालत की चिंता तो उन्हें पहले से ही नहीं थी, अब यात्रियों की जान की परवाह भी नहीं की जा रही। चंद रोज पहले की ही बात है, राजधानी में एक के बाद एक दो रोडवेज बस हादसे का शिकार हो गईं। पहले मामले में चलती बस के टायर निकले गए तो दूसरा हादसा टायर फटने से हुआ। शुक्र इस बात का है कि दोनों ही हादसों में किसी की जान नहीं गई। दोनों मामलों में जांच बिठा दी गई है। लेकिन, अधिकारियों से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि इस गंभीर मामले में कार्रवाई कितनी संजीदगी के साथ होगी। जिम्मेदारों को ट्रांसफर और अटैचमेंट से ही छुटकारा मिल जाएगा या फिर सख्ती भी दिखाई जाएगी। क्योंकि, अब तक तो निगम में ऐसी कोई नजीर पेश नहीं की गई कि कार्मिक अपने रवैये में सुधार लाएं।

चारधाम में कराह रहे बेजुबान
चारधाम यात्रा इन दिनों सुर्खियों में है। इसका कारण, श्रद्धालुओं की अनुमान से अधिक भीड़ के अतिरिक्त घोड़ों-खच्चरों की बड़ी संख्या में हो रही मौत भी है। केदारपुरी में ही 400 से अधिक घोड़ों-खच्चरों की मौत हो चुकी है। भले ही इसका स्पष्ट कारण अभी सामने नहीं आया है, मगर इतना तय है कि मौत की एक वजह घोड़ों-खच्चरों की उचित देखरेख नहीं होना भी है। प्रश्न यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। घोड़ा-खच्चर संचालक अपने पशुओं के लिए चारा तो जुटा सकते हैं, मगर उनके स्वास्थ्य आदि की जांच के लिए प्रबंध तंत्र को ही करना होगा। उच्च हिमालयी क्षेत्र में इस बार घोड़ों-खच्चरों को गर्म पानी तक उपलब्ध नहीं हो रहा। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक है कि घोड़ा-खच्चर संचालन के मानक तय किए जाएं। साथ ही संचालकों को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाए कि वह अपने पशु के स्वास्थ्य को लेकर जागरूक रहें।

छात्रों की मानसिक स्थिति परखें
एम्स ऋषिकेश में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे राजस्थान के छात्र का आत्महत्या करना बेहद चिंताजनक है। यह इस तरह की पहली घटना नहीं है। उत्तराखंड समेत देशभर में अवसाद के कारण छात्र-छात्राओं के जान देने के मामले सामने आते रहते हैं। ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए आवश्यक है कि शिक्षण संस्थानों में छात्र-छात्राओं के व्यवहार की निगरानी को सिस्टम विकसित किया जाए। इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे पाठ्यक्रम, जिनमें छात्र-छात्राओं को पढ़ाई के दौरान अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ता है, वहां तो ऐसी व्यवस्था अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। साथ ही इन संस्थानों में समय-समय पर छात्र-छात्राओं का स्वास्थ्य परीक्षण और काउंसलिंग भी की जानी चाहिए। जिससे अगर कोई छात्र मानसिक या अन्य रूप से परेशान है तो उसे समय पर उचित सहायता मुहैया कराई जा सके। शिक्षकों को चाहिए कि छात्र-छात्राओं से पढ़ाई के अतिरिक्त भी लगातार संवाद करें, जिससे उनकी मानसिक स्थिति का पता चल सके।

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