RSS के ‘डंडे’ का जवाब ‘झंडे’ से देगा सेवादल, पीएम मोदी की काशी के लिए है विशेष प्लान

नई दिल्ली     
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तीन दिवसीय 'भविष्य का भारत' कार्यक्रम समाप्त हो चुका है. इस कार्यक्रम के माध्यम से संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्वयं इस बात से पर्दा उठा दिया कि आरएसएस एक सांस्कृतिक संगठन होने के साथ-साथ राजनीतिक संगठन भी है. कार्यक्रम के आखिरी दिन भागवत से तमाम राजनीतिक सवाल पूछे गए जिसका जवाब उन्होंने राजनीतिक तरीके से ही देना मुनासिब समझा.

दरअसल मोदी सरकार में संघ का काफी विस्तार तो हुआ लेकिन वो स्वीकार्यता नहीं मिली जिसकी आरएसएस को उम्मीद थी. लिहाजा संघ प्रमुख ने बदलते माहौल के हिसाब से आरएसएस को एक समावेशी संगठन के तौर पर पेश किया. देश के सबसे पुराने दल कांग्रेस के लिए यह चिंता का विषय है. जिससे निपटने के लिए कांग्रेस ने फौजी अनुशासन और जज्बे की पहचान रखने वाले सेवादल के विस्तार की योजना बनाई है.

सेवादल की स्थापना एक महाराष्ट्री ब्राह्मण डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर ने 1923 में हिंदुस्तान सेवादल के तौर पर की थी. सेवादल की स्थापना के ठीक दो साल बाद 1925 में एक और महाराष्ट्री ब्राह्मण डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने आरएसएस की स्थापना की. कम लोगों को पता होगा कि हेडगेवार और हार्डिकर एक दूसरे के सहपाठी थें और शुरुआती दिनों में साथ-साथ सक्रिय थे. लेकिन, हार्डिकर पर महात्मा गांधीज का प्रभाव था तो हेडगेवार ‘हिंदू राष्ट्र’ की संकल्पना लेकर आगे बढ़ें.

सेवादल और संघ की कहानी भी ‘खरगोश और कछुआ’ जैसी ही है. आजादी के बाद सेवादल के पास अपना कोई लक्ष्य नहीं रहा. कांग्रेस में उपेक्षित होने के कारण इसकी भूमिका उत्सवी रवायत बन कर रह गई. जबकि, संघ अपने हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करने की दिशा में कछुआ गति से आगे बढता रहा.

संघ, बीजेपी का मातृ संगठन है. लेकिन इसके ठीक विपरीत कांग्रेस मातृ संगठन है सेवादल अनुषांगिक. कभी कांग्रेस में शामिल होने से पहले सेवादल की ट्रेनिंग जरूरी होती थी. इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी की कांग्रेस में एंट्री सेवादल के माध्यम से ही कराई थी.

लेकिन हर बार सत्ता मिलते ही संगठन को भूल जाना कांग्रेस की शैली बन गई. कांग्रेस जब-जब परेशानी में रही, सेवादल के सिपाही आगे आते रहे. ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद जब कांग्रेस के लिए पंजाब में काम करना मुश्किल था, तब सेवादल ने हिंसा के बीच रहकर संगठन का काम किया. जब 1977 में सत्ता से बाहर होते ही इंदिरा गांधी की सुरक्षा कम कर दी गई तो सेवादल ने चौबीसों घंटे उनकी सुरक्षा की. राजीव गांधी के सत्ता से बाहर होने पर भी सेवादल की जिम्मेदारी बढ़ गई थी.

आज जब कांग्रेस ऐसे ही संकट का सामना कर रही है, तो उसे फिर से अपनी जड़ों की तरफ झांकने की जरूरत पड़ रही है. सेवादल के इस विस्तार के कार्यक्रम को समझने के लिए उसके मुख्य संगठक या राष्ट्रीय अध्यक्ष लालजी देसाई से aajtak.in ने खास बातचीत की है.

संघ के 'डंडे' का जवाब 'झंडे' से देगा सेवादल

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने तीन दिवसीय भारत का भविष्य कार्यक्रम में कहा था कि तिरंगे का हम सम्मान करते हैं, लेकिन भगवा हमारा गुरू. संघ की शाखा में और शहरों-कस्बों में होने वाले प्रभातफेरी में आरएसएस के कार्यकर्ता अपने कंधे पर डंडा लेकर चलते हैं. सेवादल के मुख्य संगठक लालजी देसाई कहते हैं कि डंडा हिंसा का प्रतीक है. संघ के लोग भगवा झंडे के समक्ष आधा सलाम करते हैं जबकि सेवादल देश के तिरंगे को पूरा सलाम करता है. उनके सिर पर काली टोपी है और हमारे सिर पर सफेद. काला रंग गुस्से का प्रतीक है, जबकी सफेद शांति का प्रतीक है. लालजी देसाई कहते हैं तिरंग त्याग और भाइचारे का संदेश देता है जबकि भगवा सिर्फ एक धर्म का प्रतिनिधित्व करता है.

कांग्रेस की तरफ से सेवादल के व्यापक विस्तार को हरी झंडी मिल गई है. लालजी देसाई कहते हैं कि आने वाले दिसंबर में सेवादल की स्थापना के दिन देश में 5000 महत्वपूर्ण जगहों पर ध्वजा रोहण के साथ सेवादल संघ के खिलाफ अपना अभियान शुरू करेगा. देसाई कहते हैं कि हम संघ के डंडे का जवाब झंडे से देंगे.

बदलते समय के साथ सेवादल की संरचना में भी बदलाव

संगठनात्मक दृष्टिकोण से सेवादल और संघ की संरचना लगभग एक तरह की है. लेकिन सेवादल अब अपनी यूथ विंग और महिला विंग भी खड़ा कर रहा है. लालजी देसाई कहते हैं कि सेवादल का संगठन हर ब्लाक/प्रखंड और गांव में मौजूद है. देशभर में हमारे सदस्य हैं जो निःस्वार्थ भाव से जुड़े हैं. लाखों लोग सिर्फ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं. ये ऐसे लोग हैं जो सत्ता के लिए संगठन में नहीं आए.

लालजी देसाई कहते हैं कि सेवादल में आने वाले समय में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. अब तक कांग्रेस के कार्यक्रम में अनुशासन की जिम्मेदारी तक सीमित कर दिया गया सेवादल एक बार फिर से जनजागरण और नेतृत्व निर्माण का कार्य करने जा रहा है और यह प्रक्रिया अब सतत चलेगी. जिसका असर आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगा.

राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव पर भी जोर

साल के अंत में होने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में तकरीबन 75 सीटों पर कांग्रेस ने विशेष रणनीति तैयार की है. सेवादल के मुख्य संगठक बीजेपी के दिग्गजों को घेरने के लिए कांग्रेस सेवादल उन सीटों पर डोर टू डोर प्रचार अभियान चलाने जा रहा है जहां पिछले कई चुनावों में कांग्रेस को लगातार हार झेलनी पड़ी है.

घर घर दस्तक देने के इस अभियान के लिए संगठन की तरफ से मध्यप्रदेश की ऐसी 30, राजस्थान की  25 और छत्तीसगढ़ में 20 सीटों का चुनाव किया जा रहा है

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