Friday, October 22nd, 2021
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12 हजार साल पुरानी हैं छत्तीसगढ़ की संस्कृति - त्रिवेदी

रायपुर
भारतीय प्रशासनिक सेवा पूर्व अधिकारी, लेखक एवं स्तम्भकार, डॉ. सुशील त्रिवेदी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी), रायपुर और अहमदाबाद के संयुक्त तत्वावधान में एक भारत श्रेष्ठ भारत के तहत आज छत्तीसगढ़ की जीवंत संस्कृति  विषय पर आयोजित वेबिनार को संबोधित करते हुए कहा कि  छत्तीसगढ़ की संस्कृति 12 हजार साल पुरानी है। यह धरती पहले कोशल देश की रूप में जानी जाती थी, जिसका वर्णन हमारे प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि रायपुर जिले के ग्राम चंदखुरी में भगवान राम की माताश्री कौशल्या का मंदिर है। भगवान राम के 14 साल के वनवास में से 10 साल छत्तीसगढ़ की धरती में ही गुजरे थे। भगवान राम के दोनों पुत्रों लव और कुश की जन्म स्थली भी छत्तीसगढ़ ही है।

उन्होंने बताया कि महाकवि कालीदास ने अपने मेघदूत की रचना इसी धरती पर सरगुजा के जंगलों और पहाड़ों में की थी। संतकवि कबीरदास के शिष्य धर्मदास ने यहां पर गुरू परम्परा की शुरूआत की जिसकी गद्दी यहां दामाखेड़ा में स्थित है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ कला और संस्कृति का गढ़ है। एक ऐसा प्रदेश जहां की रंग-परंपरा दुनिया में सबसे पुरानी मानी जाती है। दुनिया का सबसे पुरानी नाट्य शाला छत्तीसगढ़ के सरगुजा में रामगढ़ के पहाड़ी पर मिलती है। रामगढ़ की पहाड़ी पर स्थित सीताबोंगरा गुपा और जोगमारा गुफा में प्राचीन नाट्य शाला के प्रमाण मिले है। डॉ त्रिवेदी ने बताया कि आधुनिक थियेटर की तरह सीताबोंगरा गुफा के भीतर मंच , बैठक व्यवस्था आदि के साथ शैल चित्र मिलते हैं। सीताबोंगरा गुफा को छत्तीसगढ़ में रंगकर्म की परंपरा का जीवंत प्रमाण के रूप में देखा जाता है।

डॉ. त्रिवेदी ने बताया कि रंग-परंपरा में छत्तीसगढ़ के नाचा-गम्मत शैली की परंपरा बेहद प्राचीन है। प्रदेश के गांव-गांव में नाचा-गम्मत की परंपरा देखने को मिलती है। न कलाकारों के पास कोई स्क्रिप्ट होती है, न संवाद लिखित में होता है। न पहले से प्रस्तुति को लेकर किसी तरह का कोई खास अभ्यास किया जाता है। सबकुछ दर्शको के सामने जीवंत होता है। महौल के हिसाब, सम-सामयिक घटनाओं, हाना-मुहावरों से हास्य और व्यंग से सराबोर होता है नाचा-गम्मत। लेकिन नाचा के इस विशिष्ट शैली को और नाचा कलाकारों नए आधुनिक तरीके से रंगकर्म की तौर-तरीकों के साथ नए प्रयोग कर उसे दुनिया में पहचान दिलाने का काम किया हबीब तनवीर ने। रंगकर्म के मास्टर हबीब तनवीर का जन्म रायपुर में हुआ था। उन्होने भोपाल में नए थियेटर की स्थापना की और नए थियेटर के जरिए पूरी दुनिया ने देखीं छत्तीसगढ़ की रंग-परंपरा, छत्तीसगढ़ के रंगकर्मियों की कलाकारी, ताकत।

डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि पद्मविभूषण श्रीमती तीजन बाई को कौन नहीं जानता। उनके पंडवानी शैली में महाभारत कथन की दुनिया कायल है। उन्होंने कहा कि पंजाब के भांगड़ा नृत्य को चुस्तीऔरफूर्ती में कोई नृत्य टक्कर दे सकता है तो वह है छत्तीसगढ़ का पंथी नृत्य जो यहां के गुरू घासी दास के सतनाम पंथ के अनुयायी करते हैं।

डॉ त्रिवेदी नेबताया कि पूरे देश में नवरात्रि के समापन पर विजयादशमी के दिन रावण दहन के साथ असत्य पर सत्य की और बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का उत्सव मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल बस्तर में भी दशहरा मनाया जाता है पर वह अपने ढंग का अनूठा उत्सव है जिसमें न रामलीला होती है और न रावण दहन होता है, बल्कि बस्तर की आराध्य देवी दन्तेश्वरी सहित अनेक देवी-देवताओं के पूजन का महोत्सव होता है। बस्तर का दशहरा दस दिन का आयोजन नहीं होता, वह तो पचहत्तर दिन चलने वाला एक वृहद् अनुष्ठान होता है जो हजारों-हजार आदिवासियों द्वारा अद्भुत आस्था और आनंद के साथ किया जाता है।

वेबिनार के प्रारम्भ में पत्र सूचना कार्यालय, अहमदाबाद के अपर महानिदेशक धीरज कांकडिया ने अतिथियों का स्वागत किया और वेबिनार के उद्देश्यों की जानकारी दी। इस वेबिनार में छत्तीसगढ़ और गुजरात के मीडिया कर्मी,गैर-सरकारी संगठनों के कार्यकर्ता, सांस्कृतिक दलों के लोक कलाकार तथा महाविद्यालयों एवं विद्यालयों के छात्र एवं छात्राएं इस वेबिनार में शामिल हुए। इस अवसर पर पत्र सूचना कार्यालय, रायपुर के अपर महानिदेशक, अभिषेक दयाल, पत्र सूचना कार्यालय, रायपुर के सहायक निदेशक सुनील कुमार तिवारी वेबिनार में शामिल हुए।

Source : Agency

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