रावण को रिहा कर BJP ने चला यह बड़ा दांव?

लखनऊ 
लोकसभा चुनाव से पहले भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर उर्फ रावण को रिहा कर बीजेपी सरकार ने बड़ा राजनीतिक दांव चल दिया है। रात 2:24 बजे चंद्रशेखर को जेल से रिहा किया गया। उन्हें बीते साल सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। पश्चिम यूपी में दलितों में मजबूत पकड़ रखनेवाले चंद्रशेखर की रिहाई से बीजेपी जहां दलितों को रिझाने की कोशिश करेगी, वहीं इससे बीएसपी के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है। 
 
महागठबंधन की कोशिशों को भी झटका 
भीम आर्मी का गठन होने के बाद से ही पश्चिम यूपी में बीएसपी प्रमुख उससे खतरा महसूस करती रहीं। मायावती ने तो इसे आरएसएस की ही चाल बताया था। हिंसा के बाद मायावती ने अपने ऊपर हमले का भी आरोप लगाया था। महागठबंधन की कोशिशों के बीच चंद्रशेखर को भी साथ लाने के प्रयास तेज हो गए थे। 

 
दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के जरिए कांग्रेस चंद्रशेखर पर लगातार डोरे डालती रही। जिग्नेश ने उनसे कई बार मुलाकात भी की थी और वाराणसी में हुए सम्मेलन में यह ऐलान भी कर दिया था कि मायावती उनकी बड़ी बहन हैं। वह और चंद्रशेखर मायावती के दाएं और बाएं हाथ हैं। इससे यह अटकलें तेज हो गई थीं कि चंद्रशेखर महागठबंधन के साथ आ सकते हैं। लखनऊ में हुए बीएसपी के मंडलीय सम्मेलन में भी पार्टी के नेताओं ने चंद्रशेखर से बहनजी के साथ आने की अपील कर दी थी। बीजेपी सरकार ने रावण को रिहाकर इस प्रयास को भी झटका देने की कोशिश की है। 

दलित आक्रोश कम करने की कवायद 
दलितों पर उत्पीड़न के लगातार आरोपों से भी बीजेपी लगातार जूझ रही है। एससी-एसटी ऐक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुए भारत बंद में दलितों पर मुकदमे हुए थे। इससे यह आक्रोश और बढ़ गया था। वहीं, रावण पर लगातार एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) बढ़ाए जाने से भी दलितों में आक्रोश बढ़ रहा था। इसके बाद ऐक्ट में संशोधन कर दलितों का गुस्सा कम करने का प्रयास हुआ। 

अब चंद्रशेखर की रिहाई को भी दलितों का आक्रोश कम करने की दिशा में एक कदम बताया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि बीजेपी चंद्रशेखर का इस्तेमाल मायावती के खिलाफ कर सकती है। इसके अलावा कांग्रेस सहित कई पार्टियों की दलितों को रिझाने की कोशिशों को भी झटका लगेगा। 

फैसले की दो बड़ी वजह 
सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी का कहना है कि चंद्रशेखर की एनएसए की अवधि नौ महीने हो ही चुकी है। इसे तीन महीने सरकार और बढ़ा सकती थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी एक याचिका पर सरकार से जवाब मांगा था। सरकार सुप्रीम कोर्ट में किरकिरी होने से भी बचना चाहती है और चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ भी लेना चाहती है। यही चंद्रशेखर की रिहाई की बड़ी वजह है। 

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