पूर्वांचल में मजबूत दिख रहा सपा का जातीय समीकरण मोदी ने कैसे बिगाड़ा?

लखनऊ

उत्तर प्रदेश में यह अक्सर कहा जाता है कि राज्य के पूर्वी इलाकों में चुनाव जीते या हारे जाते हैं। यहां 110 ऐसी सीटें हैं, जो राज्य के कुछ सबसे अधिक गरीब जिलों में फैली हुई हैं, जहां बुनियादी सुविधाएं अक्सर गायब रहती हैं, जहां नौकरियां मिलना मुश्किल है और जहां कोरोना की दूसरी लहर ने गरीब परिवारों को बुरी तरह प्रभावित किया। पूर्वांचल में 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पिछड़े और दलित समूहों का मजबूत गठबंधन अपने पक्ष में तैयार किया। 2022 के चुनावों से पहले इसे लेकर आशंका जताई जा रही थी। कहा गया कि बस्तियों और गांवों में युवाओं के पास रोजगार नहीं है। परिवारों को कोरोना ने तबाह कर दिया है, और छोटी जातियों ने उस तरह के विकास को नहीं देखा जैसा कि उन्हें पांच साल पहले वादा किया गया था।

जनवरी की शुरुआत में सपा ने पिछड़े समूहों को भाजपा से अलग करने का कदम उठाया। वरिष्ठ मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समूहों के 11 अन्य नेताओं ने सत्तारूढ़ दल से कन्नी काट ली और सपा में अपना रास्ता बना लिया। अखिलेश यादव को उम्मीद थी कि पूर्वांचल में ये दलबदल सपा को यादव-मुस्लिम पार्टी की छवि से ऊपर उठने और चुनावों के लिए अगड़ा-पिछड़ा कथा तैयार करने में मदद करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गुरुवार को घोषित नतीजों में भाजपा और उसके सहयोगियों ने क्षेत्र की 81 सीटें जीतीं, जबकि सपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सिर्फ 53 सीटें जीतीं। वहीं, बहुजन समाज पार्टी इस क्षेत्र में एक प्रभावशाली खिलाड़ी रही है, उसने पूरे राज्य में बलिया के सबसे पूर्वी जिले में सिर्फ एक जीत हासिल की।

ये कैसे हुआ?
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने भावनाओं को भाजपा के पक्ष में करने के लिए पूर्वी हिस्सों में पीएम नरेंद्र मोदी की रैलियों को श्रेय दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि एक ऐसे क्षेत्र में भाजपा के लिए लड़ाई कठिन थी, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ व्यापक आक्रोश था और कई स्थानीय नेताओं ने अनदेखी की शिकायत की थी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पार्टी के भीतर स्थानीय असंतोष फीके माहौल का निर्माण कर रहा था, जब तक कि मोदी ने कदम नहीं उठाया। मोदी ने अपनी अपील और वेलफेयर डिलिवरी के बीच व्यक्तिगत संबंध बनाना शुरू कर दिया, जिसने पिछले दो वर्षों के दौरान कई परिवारों की काफी मदद की।

पूर्वी क्षेत्र के एक नेता ने कहा, "देवरिया, सोनभद्र, बलिया और अन्य जगहों पर पीएम ने जिन रैलियों को संबोधित किया, उसके बाद मूड काफी बदल गया। लोगों ने अपनी शिकायतों को एक तरफ रख दिया और पार्टी का समर्थन करने के लिए सामने आए, यहां भाजपा की जीत का श्रेय पूरी तरह से पीएम को जाता है।" भाजपा के अभियान में इसके दो छोटे लेकिन प्रभावशाली सहयोगी भी थे- अपना दल (सोनेलाल), जिसने 12 सीटें जीतीं और निषाद पार्टी, जिसने 6 सीटें जीतीं। इन पार्टियों ने गरीब लेकिन स्थानिक रूप से केंद्रित जातियों के बीच समर्थन हासिल किया। करीबी मुकाबले वाली सीटों पर ये समुदाय बीजेपी की जीत में मदद करते हैं।

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