शरद पवार के कैंडिडेट नहीं बनने से नाराज थी ममता बनर्जी, उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकता को दिया झटका

 नई दिल्ली।
 
राष्ट्रपति चुनावों में जहां सांसदों और विधायकों द्वारा एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग किए जाने की खबरें आई हैं, वहीं उपराष्ट्रपति चुनावों को लेकर विपक्षी दलों के बीच मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आ गए हैं। तृणमूल कांग्रेस के रुख से स्पष्ट हो गया है कि वह विपक्ष की तरफ से लिये जाने वाले तमाम फैसलों में खुद को केंद्र में रखे जाने के पक्ष में है। तृणमूल कांग्रेस ने राष्ट्रपति चुनाव से दूर रहने का फैसला किया है। यानी वह किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं करेगी।

राजनीतिक जानकारों की मानें तो तृणमूल कांग्रेस की नाराजगी की वजह कांग्रेस नेता माग्रेट अल्वा को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित किया जाना है। सूत्रों के अनुसार, उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्ष की बैठक में तृणमूल को अंतिम समय में सूचना दी गई जिसकी वजह से उसका कोई प्रतिनिधि उसमें शामिल नहीं हो सका। हालांकि, जब विपक्ष ने माग्रेट अल्वा का नाम तय कर लिया तो शरद पवार ने ममता से बात की। लेकिन तब ममता ने कुछ नहीं कहा।

राष्ट्रपति चुनाव से ही शुरू हुई थी ममता की नाराजगी
दरअसल, ममता की नाराजगी उससे पहले ही राष्ट्रपति चुनाव से ही शुरू हो गई थी। ममता की तरफ से शरद पवार को उम्मीदवारी का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन पवार के इनकार के बाद यशवंत सिन्हा का नाम आया। यह नाम तृणमूल की तरफ से नहीं बल्कि माकपा की तरफ से सुझाया गया। लेकिन तब पवार के अनुरोध पर ममता भी मान गईं। हालांकि, बाद में तृणमूल कांग्रेस ने यह जताने की कोशिश भी की कि यशवंत सिन्हा उनकी की पसंद हैं। जबकि हकीकत में ऐसा नहीं था।
 
टीएमसी की एक नहीं चली
दरअसल, राष्ट्रपति चुनाव में यशवंत सिन्हा की उम्मीदवारी से बाहर यह संदेश गया कि ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति के केंद्र में हैं। वह ऐसा चाहती भी हैं। इसलिए वह पवार को आगे कर रही थी। लेकिन सच्चाई यह है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों उम्मीदवार तय करने में तृणमूल की नहीं चली। यही उसकी नाराजगी की असल वजह है।

उपराष्ट्रपति चुनाव में भी एनडीए की जीत तय है, इसलिए प्रत्यक्ष रूप से तृणमूल कांग्रेस के इस फैसले से चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन बार-बार विपक्ष एकजुट होने की बात करता है लेकिन जमीनी हालात एकदम उलट हैं। खुद कई मौकों पर विपक्ष को एकजुट करने के प्रयास में जुटने वाली तृणमूल कांग्रेस अब खुद ही विपक्ष के साथ खड़ी नहीं है। कारण भले ही जो हो लेकिन इसका सीधा संदेश विपक्षी एकता के खिलाफ है।

 

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