संरक्षण के अभाव में कांकेर के उपेक्षित बैलेंसिंग रॉक को नहीं मिली पहचान

कांकेर
जिला मुख्यालय के पहाडि?ों में दिखने वाले चट्टानों की अपनी एक अलग विशिष्टता है। छोटे पत्थरों के ऊपर बड़ी चट्टानें टिकी हुई है, तो कहीं बड़े पत्थरों में छोटे पत्थर चढ़े हुए दिखाई पड़ते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पत्थर गिरने ही वाला है, लेकिन तेज आंधी और तूफान भी इन पत्थरों को टस से मस नहीं कर पाते। इन विशाल लटकते पत्थरों की अपनी अलग पहचान है। जिसे बैलेंसिंग रॉक या समतोल चट्टान कहा जाता है।

कांकेर के बैलेंसिंग रॉक्स या समतोल चट्टान की तरह देश में जबलपुर, महाबलीपुरम सहित कई जगहों पर बैलेंसिंग रॉक पाए जाते हैं, जिसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित भी किया गया है। लेकिन छत्तीसगढ़ के कांकेर जिला मुख्यालय के आसपास की पहाडि?ों में स्थित उपेक्षित बैलेंसिंग रॉक को अब तक पहचान नहीं मिल सकी ना ही इसे संरक्षित करने की कोई कोशिश की गई है। कांकेर के बैलेंसिंग रॉक को पर्यटन से जोड़कर महाबलीपुरम की तरह विकसित किया जा सकता है।

भू-गर्भ वैज्ञानिक किशोर पानीग्राही ने बताया कि कांकेर ग्रेनाइट शिलाओं से घिरा हुआ है, इसके बनने की प्रक्रिया कुछ ऐसी है कि मैग्मा लावा जब ठंडा होकर जम जाता है और ठोस अवस्था को प्राप्त कर लेता है तब इस प्रकार की चट्टानों का निर्माण होता है। उन्होने बताया कि मौसम के प्रभाव के कारण चट्टानों का शरण (ठहराव) होता है। शरण की प्रक्रिया सामान्यत: नीचे भाग की तरफ ज्यादा होती है, ऊपर की तरफ कम होती है। जिसके चलते नीचे की शिलाएं कणों से टकराकर जल्दी बैठ जाती है, ऊपर की शिलाएं बड़े आकार में ही रहती है। यहां एक बहुत छोटे से बिंदु पर बहुत बड़ी शिला टिकी हुई है।

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