नालंदा के जिला जज ने जमींदार के नकली बेटे को और कड़ी कर दी सजा

बिहारशरीफ
नालंदा जिले के एक जमींदार की संपत्ति पर ऐसे शख्‍स ने कब्‍जा जमा लिया, जिसके बारे में कोर्ट ने माना कि वह जालसाज है। यह मामला बड़ा दिलचस्‍प है। संपत्‍त‍ि का मौजूदा मालिक जमींदार का बेटा नहीं है, बल्‍क‍ि उसने शातिर तरीके से यह झूठ गढ़ा। 41 साल बाद दयानंद गोसाईं को एसीजेएम-पांच मानवेंद्र मिश्रा ने जालसाज करार दिया था। इस मामले में दयानंद ने जिला जज के पास अपील की, लेकिन इसका असर उल्‍टा हो गया है। जिला जज ने भी उसे दोषी मानते हुए उसकी सजा और कड़ी कर दी है। साथ ही उसका जमानत बंध पत्र भी रद हो गया है।

नालंदा जिले के सिलाव (वर्तमान में बेन) थाना क्षेत्र के मोरगावां निवासी जमींदार कामेश्वर सिंह का 41 साल तक बेटा बनकर रहने वाले दयानंद गोसाईं को अपील कोर्ट ने भी शनिवार को जालसाज करार दे दिया। एसीजेएम-पांच मानवेंद्र मिश्रा के फैसले पर जिला जज रमेशचंद्र द्विवेदी ने अपनी मुहर लगा दी। एसीजेएम-पांच की ओर से दयानंद गोसाईं को दी गई तीन साल की सजा को सश्रम कारावास में बदल दिया। उसे एक हफ्ते के अंदर लोअर कोर्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया।

252/1981 में सिलाव थाने में दर्ज केस में पिछले पांच अप्रैल को दोषी करार दिए जाने के बाद जमानत पर निकले कन्हैया का अब बेल बांड भी रद हो गया। बेल लेने के लिए उसे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा। वहीं 252/1981 की सुनवाई के दौरान गलत साक्ष्य देने के मामले में दयानंद गोसाईं पर बिहार थाने में कांड संख्या 358/2022 दर्ज हुआ है। इसमें बीते 25 मई को पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी कर लिया है। इस मामले में भी अब तक दयानंद गोसाईं को बेल नहीं मिली है। वह चार दिनों से जेल में बंद है।

मैट्र‍िक की परीक्षा देने गया बच्‍चा हो गया था गायब
बेन थाना क्षेत्र निवासी कामेश्वर सिंह जमींदार थे। उनके इकलौते पुत्र कन्हैया थे। कन्हैया 1975 में मैट्रिक की परीक्षा देने चंडी गए थे। वहां से वह गायब हो गए। काफी खोजबीन के बाद जब वह नहीं मिले तो सिलाव (वर्तमान में बेन) थाने में केस दर्ज कराया गया। इसी दौरान 1981 में साधु के वेश में एक युवक मोरगावां में भीख मांगते पहुंचा। उसने अपने को जमींदार कामेश्वर सिंह का पुत्र होने की बात कही। कामेश्वर ङ्क्षसह 75 वर्ष की उम्र में युवक से मिलने पहुंचे। युवक कामेश्वर सिंह को पिता-पिता कहते हुए गले से लिपट गया। हालांकि तब पिता ने भी शक जताया।

गांव-समाज के लोगों ने कहा कि पांच वर्ष बीत जाने के कारण आप इसे पहचान नहीं पा रहे हैं। तब उन्होंने लोगों की बात मानकर युवक को अपने घर में रख लिया। युवक के घर पहुंचने पर मां रामसखी देवी ने भी कहा कि यह मेरा बेटा नहीं है। तब कामेश्वर सिंह की तबीयत ठीक नहीं थी। उन्हें सदमा न लग जाए, इस कारण रामसखी देवी ने उस वक्त कुछ नहीं कहा। इसके बाद कामेश्वर सिंह को समझाया। उन्हें बताया कि यह हमारा बेटा नहीं है। तब 1981 में केस दर्ज हुआ।

केस से जुड़ीं महत्वपूर्ण तिथियां
21 नवंबर 1981 को सिलाव थाने में आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ।
10 नवंबर 1991 को पटना सिविल कोर्ट में टाइटल सूट दर्ज हुआ।
1995 तक कन्हैया की मां रामसखी देवी व कामेश्वर सिंह की मौत के बाद केस को लोअर कोर्ट ने खारिज कर दिया।
1995 में ही हाईकोर्ट ने भी विद्या देवी को इस मामले में साक्ष्य देने से मना कर दिया
1995 में ही माननीय सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां विद्या देवी को पक्ष रखने के लिए लोअर कोर्ट को आदेशित किया गया।
1996 में व्यवहार न्यायालय बिहारशरीफ में फिर से इस मामले की सुनवाई शुरू हुई।
05 अप्रैल 2022 को इस मामले में एसीजेएम-पांच मानवेंद्र मिश्रा ने फैसला सुनाया
20 अप्रैल को अपील कोर्ट में फाइल हुआ
25 मई को दोनों पक्षो के वकीलों की दलील सुनकर जिला जज ने फैसला रख लिया था सुरक्षित
28 मई को सुबह साढ़े 11 बजे से हुई सुनवाई, पांच मिनट में जिला जज ने सुना दिया फैसला

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