शाकाहारी हुआ इफ्तार का दस्तरखान, सीक-कबाब की बजाय अब दहीबड़े, वेजिटेबल कटलेट सजने लगे

उदयपुर
रमजान के महीने में इफ्तार के दस्तरखान पर महंगाई का दिखाई देने लगा है। यूं भी कह सकते हैं कि महंगाई के कारण अब लोग नॉनवेज को छोड़कर वेजेटेरियन हो गए हैं। 250 से 400 रुपये किलो नींबू की वजह से शिकंजी तो गायब है और अन्य पेयजल ने इसकी जगह ले ली है। अब नॉनवेज से बनने वाले सीक-कबाब, टिकिया भी नदारद हो चुके हैं। अब दहीबड़े, सांभरबड़ा, वेजिटेबल कटलेट से दस्तरखान सजाए जा रहे हैं। दूसरी खास बात यह है कि डॉक्टरों ने भी रमजान के महीने में नॉनवेज इस्तेमाल नहीं करने की सलाह देते हैं।

महंगाई इतनी बढ़ गई है कि बकरे का मीट 600 रुपये किलो तक पहुंच गया है जो आम आदमी से दूर होता जा रहा है। नींबू 600 रुपये किलो है। ऐसे में इस बार रमजान में शाकाहार पर ज्यादा जोर है। माहे रमजान में पूरा दिन भूख प्यास के बाद आमतौर पर दस्तरखान नॉनवेज के आइटम से सजे हुए दिखाई देते थे। मुस्लिम इलाकों में सीक-कबाब की दुकानों पर शाम से भीड़ दिखाई देने लगती थी, लेकिन इस बार नजारा कुछ बदला गया है। जयपुर, हैदरबाद, अहमदाबाद आदि शहरों में इफ्तार के समय हलीम का इस्तेमाल होता है। इसमें सभी तरह के अनाज डाले जाते हैं। नॉनवेज की मात्रा बहुत ही कम होती है जो तैयार होने के बाद दिखाई भी नहीं देती है।

गृहिणी समीना परवीन बताती हैं कि पहले के मुकाबले नॉनवेज बहुत ही कम हो गया है। आज से चार-पांच साल पहले तक इफ्तार में हर दिन नॉनवेज का कोई न कोई आइटम जरूर होता था, मसलन सीक, कबाब, टिकिया, रोल आदि। अब महंगाई इतनी है कि रमजान के पूरे महीने में दो से पांच दिन ही ऐसा हो पाएगा। इनकी जगह अब वेजिटेबल कटलेट, दहीबड़े, इडली सांभर, खमण आदि ने ले ली है। हमारे और रिश्तेदारों में हर घर में एक दो लोग तो नॉनवेज के हाथ तक नहीं लगाते हैं। हेल्थ को लेकर डॉक्टर भी यही सलाह देते हैं कि रोजा रख रहे हैं तो नॉनवेज या किसी भी तरह के भारी खाने से बचना चाहिए।

उदयपुर में बकरे के मीट के व्यापारी अब्बास ने बताया कि तीन साल पहले तक वो हर दिन 15 से 20 किलो बकरे का गोश्त बेचता था। इस वक्त 3 से 5 किलो गोश्त भी नहीं बिक रहा है। यह महंगाई का ही असर है। चिकन सस्ता है, लेकिन लोग इसको कम पसंद करते हैं। सीक कबाब की दुकानें बंद होने से भी व्यापार पर असर पड़ा है। पाड़े का गोश्त सस्ता मिल रहा है, लेकिन उसको खाने वाले का एक वर्ग अलग ही है। उलेमा हाफिज सिद्दीक बताते हैं कि रमजान महीने में आप दिनभर भूखे प्यासे रहते हैं तो खाना हल्का ही लेना चाहिए। महंगाई का असर है। नमाज के बाद उलेमाओं की तकरीर में खाने पीने की चीजों का जिक्र नहीं करते हैं। हमारी तकरीर सिर्फ अल्लाह की इबादत पर होती है। इस पवित्र माह में लोग कैसे नमाज पढ़े, कुरान पढ़े और अल्लाह की इबादत करे।

 

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