वनमाली कथा सम्मान समारोह के अंतर्गत नाटक “आदमी और कुत्ता” का मंचन

नाटक में रेल का डिब्बा वो स्थान है जहां अपरिचित लोग एक दूसरे के साथ लंबा समय बिताते है और उसी दौरान एक दूसरे के व्यवहार आचार-विचार से परिचित हो जाते हैं।

नाटक में रेल का डिब्बा वो स्थान है जहां अपरिचित लोग एक दूसरे के साथ लंबा समय बिताते है और उसी दौरान एक दूसरे के व्यवहार आचार-विचार से परिचित हो जाते हैं। रेल में पुरा संसार चलता है। भांति- भांति के लोग। एक समय था जब यात्रा के दौरान यात्रियों से परिचय, उनसे खेल, राजनीति, धर्म की चर्चा यहां तक की आपसी सुख- दुख जैसी व्यक्तिगत बातों को सांझा किया जाता था। एक दूसरे के घर से लाए गए खानों को बांट कर खाया जाता था, लेकिन परिस्थितियां बदल चुकी है। वर्तमान में व्यक्ति अकेले यात्रा करता है अपने आस-पास की घटनाओं से अनभिज्ञ। अपने मोबाइल और लैपटॉप में व्यस्त रहता है। ऐसे में इस कहानी की परिस्थिति मुझे जीवंत लगी। कहानी को पूर्वाभ्यास के दौरान कलाकारों द्वारा इंप्रोवाइज कर नाटक की शक्ल देने की कोशिश है जबकि कहानी अपने आप में संपूर्ण है।

जगन्नाथ प्रसाद चौबे नवमाली जी की कहानी आदमी और कुत्ता, मनुष्य के पशु के अंतर को प्रस्तुत करता है। इंसान बने रहने की कोशिश, सदियों से मनुष्य सिर्फ स्वयं के ही नफे नुकसान को देखता आ रहा है। नफा पाने के लिए या नुकसान से बचने के लिए एक दुसरे के सामने गिड़गिड़ाता है। हक हो या सुविधा अपने कद अनुसार कुछ कीमत देकर उसे पाने की कौशिश करता रहा है। वर्तमान में भी हम अपने आस पास इस तरह की घटना को अक्सर घटता हुआ पाते है और मूक दर्शक बन देखते हैं और हस्तक्षेप करने के बजाय परिस्थिति का आस्वादन लेते हैं जैसे हम उस दायरे से बाहर हो। कहानी आदमी और कुत्ता में दो संवाद जिसे मुझे नाट्य प्रस्तुति के लिए प्रेरित करती है। एकः आदमी तो कुत्ता है, रोटी का टुकड़ा डाल दिया उसका भौंकना बंद। दूसरा: यह कैसा भयानक विश्वास है जो आदमी को कुत्ता समझने को मजबूर करता है। प्रस्तुत नाटक में लेखक के माध्यम से आदमी के भीतर आदमी से मिलने की एक कवायद है।

मनोज नायर वर्तमान में रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक है। आप पिछले 30 वर्षों से रंगमंच में सक्रिय है। रंगमंडल भारत भवन से लेकर हबीब तनवीर के सानिध्य में रहकर लगभग 35 नाटकों में अभिनय किया और देश-विदेश में प्रस्तुतियां दी है। 2001 में शैडो नाट्य संस्था का गठन किया जो मध्यप्रदेश में मूकाभिनय पर काम करने वाली एक मात्र संस्था है। अब तक 30 से भी अधिक नाटकों का निर्देशन। 5 नाटकों, 20 लघु नाटकों का लेखन और मंचन। विभिन्न आकारों का आयामों के जीवन में हस्तक्षेप को लेकर नाटकों का लेखन और मंचन, जिसमें बाक्स, लास्ट एंगल, बिग बैंग उल्लेखनीय है। 15 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के लिए नाट्य कार्यशालाओं का संचालन। कविताओं और गीतों के मंचन में तानाबाना, मुक्ति का महायज्ञ, कविता यात्रा, बालगीत, हमारी सारी दुनिया, अंर्तलय आदि शामिल है।

वनमाली हिन्दी के कथा जगत के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। 1934 में उनकी पहली कहानी जिल्दसाज कलकत्ता से निकलने वाले विश्वामित्र मासिक में छपी और उसके बाद लगभग पच्चीस वर्षों तक वे प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं सरस्वती, कहानी, विश्वामित्र, विशाल भारत, लोकमित्र, भारती, माया, माधुरी आदि में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे। अनुभूति की तीव्रता, कहानी में नाटकीय प्रभाव, सूक्ष्म मनौवैज्ञानिक समझ और विश्लेषण की क्षमता के कारण उनकी कहानियों को व्यापक पाठक वर्ग और आलोचकों दोनों से ही सराहना प्राप्त हुई। आदमी और कुत्ता कहानी को आचार्य नंददुलारे वचाजपेयी ने अपनी श्रेष्ठ के संकलन में स्थान दिया था।

  • लेखक – जगन्नाथ प्रसाद चौबे, वनमाली
  • नाट्य रूपांतरण – मनोज नायर
  • परिकल्पना एवं निर्देशन – मनोज नायर
  • संगीत संयोजन – अलैय खान, अभि श्रीवास्तव
  • प्रकाश परिकल्पना- अनूजैन
  • मंच पर: अपूर्व दत्त मिश्रा, अलैय खान, अभि श्रीवास्तव, मिलिंद दाभाड़े, अनंत राजोरिया, सोनू चतुर्वेदी, हर्षवर्धन सिंह राजपुत।
  • मंच सहयोगः नैनी जवांश, सुमित सिंह चंदेल, आदर्श ठस्सू
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