प्रकृति की गोद में बसा शिवसाधना का प्राचीनतम केन्द्र चन्दरेह मंदिर

रीवा
संपूर्ण विन्ध्य का क्षेत्र प्राचीनकाल से ही ऋषि-मुनियों की तपस्या का केन्द्र रहा है। पुण्य सलिला नर्मदा तथा सोन के उद्गम से लेकर चित्रकूट में मंदाकिनी तट पर भगवान श्रीराम के चरणों से पावन हुयी यह भूमि प्राचीन मंदिर वास्तुकला का केन्द्र है। भारत ही नहीं विश्व के सबसे प्राचीन दस मंदिर इसी क्षेत्र में स्थित है। सीधी जिले के चन्दरेह में स्थित प्राचीन शिव मंदिर और मठ इन्हीं में से एक है। प्रकृति की गोद में तीन नदियों के संगम पर स्थित यह मंदिर शैव सम्प्रदाय की मत मयूर शाखा का प्रमुख केन्द्र था। मंदिर का शिवलिंगाकर तथा जगती का जलहरी रूप अद्भुत है। यह मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से कल्चुरी कालीन कला का उत्कृष्ट नमूना है।

    चन्दरेह सीधी जिला मुख्यालय से सिमरिया होकर 55 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। चन्दरेह सोन वनास तथा महान नदियों का संगम है। इसके पाश्र्व में केहेचुआ पहाड़ है। इसका प्राचीन नाम भरमार है। वर्तमान में इसे भंवरसेन नाम से जाना जाता है। यह सीधी जिले का पुरातात्विक तथा धार्मिक महत्व का स्थल है। मकर संक्रांति में यहां विशाल मेला लगता है। चन्दरेह मंदिर पहले सोन के किनारे बनाया गया था लेकिन अब नदियों का संगम मंदिर से कुछ दूर हो गया है। अब भी इस मंदिर के चारों ओर सुंदर प्राकृतिक वन तथा पर्वत है।

    चन्दरेह में एक शिव मंदिर तथा विहार है। ऐसा प्रतीत होता है कि विहार का निर्माण पहले हुआ है। इसके बाद कालान्तर में मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की गयी है। मठ में लगे अभिलेख में इन्हें पशुपतिनाथ कहा गया है। शिव मंदिर पश्चिमाभिमुख है। यह पत्थर की उँची कुर्सी पर बना है। इसका आकार शिवलिंग की जलहरी की तरह है। यह 15 मीटर लंबा 10.25 मी. चौड़ा तथा 2.15 मीटर उँचा है। मंदिर की लम्बत योजना में अधिष्ठान, जंघा एवं शिखर महत्वपूर्ण है। इसके शिखर में चन्द्र आकार में अलंकरण किया गया है। इसकी जंघा का निचला हिस्सा उपरीभाग की तुलना में बड़ा है। इसमें 11 रथों की लम्बत रचना है। इसका शिखर अलंकृत है। सबसे उपर एक देव कोष्ठ है जिसमें रत्न पुष्प अलंकरण बना हुआ है।

    मंदिर की क्षैतिज योजना में मंदिर के प्रमुख अंग गर्भगृह अंतराल एवं मंडप है। गर्भगृह वृत्ताकार है। इसके ठीक सामने अंतराल तथा मंडप है। मंडप का आकार में 54 मीटर लंबा तथा 2.25 मीटर चौड़ाई का है। इसकी छत स्तंभों पर आधारित है। स्तंभ अलंकारपूर्ण है। मंडप का वितान वृत्तों से बना हुआ है। मंदिर का द्वार सादा है। जगती से मंदिर तक पहुचने के लिये छ: सीढ़ियाँ है। मंदिर के समीप दो मंजिला मठ है। इसकी दूसरी मंजिल छतिग्रस्त हो गयी है। मठ का प्रवेश द्वार उत्तर की ओर है। इसके दोनों ओर गंगा-यमुना की प्रतिमा अंकित है। इन्हीं के समीप परिचारिका तथा शिवगण भी उत्कीर्ण है। यह मठ लाल बलुआ पत्थरों से बना है। इसमें दो तरह के कक्ष है । छोटे और अलंकृत द्वार वाले कक्षों का उपयोग संभवतः पूजा-जप-तप के लिया किया जाता रहा होगा । सादे द्वार वाले कक्षों का उपयोग आवास के लिये होता होगा। मठ के ही अंदर एक कूप है।

     मंदिर का स्थापत्यं कलचुरी कालीन है। इसे गोर्गी के चेदिवंश के शासको के संरक्षण में 850 से 1015 ईस्वी के मध्य मतमयूर शैव गुरूओं द्वारा बनवाया गया । इसके निर्माणकर्ता के रूप में मठ में लगे अभिलेख में शिव आचार्य प्रवोध शिव तथा प्रशान्त शिव का उल्लेख है । इतिहासकार डा. राधेशरण के अनुसार पहले गोर्गी में चेदिराजवंश के यहाँ शैव मठ स्थापित किया गया । बाद में प्रवोध शिव ने गोर्गी त्यागकर चन्दरेह में मुख्य शैवपीठ स्थापित की । इसका स्थापत्य तथा उपयोग की गयी निर्माण सामग्री कलचुरीकाल का प्रमुख उदाहरण है। मंदिर तथा मठ चिकने बलुआ पत्थर से बनाये गये है। इसका शिवलिंगाकार होना अद्वितीय है । इस तरह का एक अन्य मंदिर त्रिवेन्द्रम केरल का परसुरामेश्वर मंदिर है । अभिलेख के अनुसार इसका निर्माण फाल्गुन छठी 324 संवत में हुआ । यह तिथि कल्चुरी संवत की है मठ में लगे इसकी वास्तविक तिथि नवीं से दसवीं शताब्दी ईस्वी की है। मंदिर दामोदर नामके कारीगर ने इंजीनियर सुराक की देख-रेख में बनाया था ।
 
    मंदिर में लगे अभिलेखों के संबंध में पुरातत्व विभाग के परिचारक ने बताया कि. मठ के दायें ओर उत्कीर्ण शिलालेख में भगवान शिव के तांडव रूप का वर्णन है। इसमें शिव जी को प्रशंसा में श्लोक कहे गये है । दूसरे अभिलेख में मंदिर का निर्माण कराने वाले प्रवोधशिव का उल्लेख है । इसने मंदिर के समीप की प्रकृति का मनोहारी वर्णन किया गया है। जिसके अनुसार इस साधना स्थल के प्रभाव से वहाँ रहने वाले वन्य प्राणियों ने वैरभाव त्याग दिया है। सिंह का मुख कपि चूमते हैं। सिंहनी मृग शवकों को पयपान कराती है। पर्वत पर मधुमक्खियों के इतने छत्ते है कि वे बादल का आभास देते है। दोनों शिलालेख प्राचीन देवनागरी लिपि में पाली भाषा में है । इनके रचनाकार का नाम महाकवि धांसठ दिया गया है। प्रशांतशिव प्रभाव शिव के शिष्य थे। इन्हें गोर्गी के चंदि नरेश युवराज देव के समय मठ का प्रमुख बनाया गया । प्रशान्त शिव ने ही रीवा जिले के महसांव तथा चन्द्रेह में शिव मंदिरों का निर्माण कराया। महसांव का मंदिर अब नष्ठ हो चुका है ।

    चन्दरेह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शैठ मठ था। इसके समीप ही सोन, वनास और महान नदियों का संगम है। प्राचीनकाल में इसके आसपास घनघोर वन रहा होगा । समय के साथ आसपास आबादी बड़ा वनों के विनाश से यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य अब पहले जैसा नहीं रहा लेकिन अपने अद्भुत शिल्प के कारण चन्देह का शिव मंदिर अब भी पुरातत्ववेत्ताओं और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।

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