3 साल में 63 मामलों में अभियोजन स्वीकृति हुई अमान्य, सालों सरकार के पास पड़े रहे प्रकरण

भोपाल

भ्रष्टाचार के मामलों में कोर्ट की कार्यवाही से बचने के लिए बेक डोर वाले रास्ते को पिछले तीन साल में 63 मामलों में उपयोग किया गया। शासन ने इतने मामलों में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अफसरों और कर्मचारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव अमान्य कर दिया। इनमें से कई मामले तो शासन के पास स्वीकृति के लिए कई सालों तक पड़े रहे। इनमें से कई मामले तो 9 साल पुराने तक हैं।

जानकारी के अनुसार लोकायुक्त पुलिस में वर्ष 2013 में तत्कालीन मुख्य नगर पालिका अधिकारी दमोह आरपी मिश्रा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में से चार मामलों में अभियोजन स्वीकृति अमान्य कर दी। वर्ष 2015 में भिंड के तत्कालीन कार्यपालन अधिकारी नरेश चंद्र शर्मा के दस मामलों में 12 दिन के भीतर वर्ष 2019 में अभियोजन स्वीकृति अमान्य की गई। उन पर लोकायुक्त पुलिस ने एक के बार एक कर दस मामले दर्ज किये थे। इनमें से एक मामले में उनके साथ उपयंत्री रविशंकर शर्मा को भी आरोपी बनाया गया था। रविशंकर की भी अभियोजन स्वीकृति  वर्ष 2021 में अमान्य कर दी गई।

एक साल बाद पता चला
दमोह के मुख्य नगर पालिका अधिकारी आरपी मिश्रा की अभियोजन स्वीकृति अमान्य किये जाने के बाद लोकायुक्त पुलिस को इस संबंध में एक साल बाद जानकारी मिली। मिश्रा के चार मामलोें में अक्टूबर 2018 में अभियोजन स्वीकृति अमान्य कर दी गई थी, जबकि लोकायुक्त पुलिस को यह सूचना नवंबर 2011 में मिली।

ऐसे जाता है प्रस्ताव
लोकायुक्त पुलिस किसी भी अफसर के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अदालत में चालान पेश करने के लिए विभाग से अभियोजन स्वीकृति लेती होती है। यह पूरी प्रक्रिया विधि विभाग के जरिए होती है। इसमें एक बोर्ड होता है। जो यह तय करता है कि अभियोजन स्वीकृति दी जाना है या नहीं।

दो साल पहले हुई सबसे ज्यादा अमान्य स्वीकृति
वर्ष 2020 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में अभियोजन स्वीकृति नहीं दिए जाने के मामले में अव्वल रहा। इस वर्ष 29 आरोपियों को राहत मिली। जबकि वर्ष 2021 में 15 आरोपियों और वर्ष 2022 में अब तक 11 आरोपियों की अभियोजन स्वीकृति अमान्य कर दी गई है।

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