मुजफ्फरनगर-शामली में दिखा गठबंधन का दम, पिता अजित सिंह की ख्वाहिश पूरी करने में कामयाब रहे जयंत

नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बड़ी जीत मिली है। उसने अकेले दम पर 255 सीटें जीता हैं, जो बहुमत के आंकड़े से कहीं ज्यादा है। भाजपा भले ही प्रदेश में जबरदस्त जीत हासिल करने में कामयाब रही लेकिन कुछ जिले ऐसे भी हैं, जहां योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी का जादू कम ही चल पाया है। इनमें मुजफ्फरनगर और शामली भी हैं, जो 2013 के दंगों के बाद से खासतौर से चर्चा में रहे हैं।
 
क्या रहा हार जीत का समीकरण
शामली जिला कुछ साल पहले तक मुजफ्फरनगर का ही हिस्सा था। ऐसे में दोनों जिलों की नौ विधानसभा सीटों को एक साथ ही जोड़कर देखा जाता है। इस चुनाव में इन नौ सीटों में से सपा-रालोद को सात और भाजपा को दो सीटें मिली हैं। शामली की तीनों सीटें गठबंधन को मिली हैं जबकि मुजफ्फरनगर की सदर और खतौली सीट भाजपा जीतने में कामयाब रही है। मुजफ्फरनगर की मीरापुर, पुरकाजी और बुढ़ाना रालोद ने जीती हैं। चरथावल पर सपा जीती है। शामली की कैराना पर सपा को तो थानाभवन और शामली पर रालोद को जीत मिली है।
 
नतीजे क्यों हैं अहम
उत्तर प्रदेश के कई ऐसे जिले हैं, जहां सपा और सहयोगियों ने अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन इन सीटों की खासतौर पर चर्चा करने की वजह है। दरअसल 2013 में मुजफ्फरनगर में साप्रंदायिक दंगा हुआ था, जिसे खासतौर से जाटों और मुसलमानों का संघर्ष माना गया था। इसमें मुजफ्फरनगर के अलावा शामली, कैराना भी प्रभावित हुआ था। इस दंगे के बाद ना सिर्फ इन जिलों में बल्कि पूरे वेस्ट यूपी में ही भाजपा का ग्राफ अचानक बढ़ गया था। लगातार राजनीति के जानकारों ने माना कि दंगे का सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को हुआ है। वहीं रालोद को इससे सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इस चुनाव में वो 2014, 2017, 2019 के मुकाबले में इन जिलों का वोटिंग पैटर्न एकदम बदला हुआ दिखा।

जाट-मुस्लिम को एक साथ ले आए जयंत
इस चुनाव में जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर इलेक्शन लड़ा। जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का सबसे ज्यादा वोट किसानों (खासतौर से जाटों और मुस्लिमों) में माना जाता है। दंगे के बाद जाट-मुसलमानों में खाई बनी तो राष्ट्रीय लोकदल एकदम कमजोर हो गई। खुद अजित सिंह और जयंत चौधरी अपने लोकसभा चुनाव (2014 और 2019) हार गए। इस चुनाव के आंकड़े देंखें तो ऐतिहासिक तौर पर जाट और मुस्लिमों ने मिलकर सपा-रालोद को वोट किया। शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत में मायावती का कोर वोट (दलित वोट) पूरी तरह से भाजपा को शिफ्ट होने के बावजूद गठबंधन के बेहतर प्रदर्शन की भी यही वजह रही है। जाट और मुसलमानों का एक साथ गठबंधन के साथ आ जाना की वजह से ही शामली और मुजफ्फरनगर में नौ में से सात सीटों पर जीत मिली। वहीं बिजनौर, बागपत, मेरठ की सीटों पर भी ये गठजोड़ दिखा है, भले ही इन जिलों में उस तरह की सफलता गठबंधन को ना मिली हो।

अजित सिंह की ख्वाहिश पूरी करने में कामयाब हुए जयंत?
2013 के दंगों के बाद अगर वेस्ट यूपी में मुसलमानों और जाटों के बीच खाई पाटने की कोशिशें किसी बड़े राजनेता ने की तो वो पूर्व केंद्रीय मंत्री मरहूम अजित सिंह थे। उन्होंने कई बार मुसलमान और जाटों के साथ बैठके कीं। 2019 में मुजफ्फरनगर से लोकसभा का चुनाव लड़ते हुए मंचों से कई बार उन्होंने कहा कि मेरा यहां से लड़ने का मकसद दो खाई बनी है, उसे पाटना है और मैं कुछ नहीं चाहता। उन्होंने ये भी कहा कि वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे लेकिन एका करने के लिए उन्होंने ये फैसला लिया। अजित सिंह तो चुनाव नहीं जीत सके लेकिन उनके बेटे जयंत चौधरी की अगुवाई में जिस तरह से मुजफ्फरगर, बागपत, मेरठ, बिजनौर जैसे जिलों में जाट और मुस्लिम एक साथ आए हैं। उससे निश्चित ही ये कहा जा कि वो अपने पिता की आखिरी ख्वाहिश को पूरा करने में एक हद कामयाब रहे हैं। उनका गठबंधन भले ही चुनाव हारा है लेकिन उन्होंने हारकर भी एक बड़ी लड़ाई जीती है।

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