यूपी एमएलसी चुनाव: यादवलैंड में भी नहीं दौड़ी साइकिल, तीन दशक बाद टूटा वर्चस्व

कन्‍नौज

पहले लोकसभा चुनाव, उसके बाद विधानसभा चुनाव और अब विधान परिषद चुनाव। लगातार तीन चुनाव में सपा अपने सबसे मजबूत गढ़ में भाजपा के हाथों शिकस्त खा चुकी है। बीच में पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में भी भाजपा ने यहां के सभी ब्लॉक और जिला पंचायत में भाजपा ने कब्जा कर लिया था। इस जिले में अब सपा की झोली पूरी तरह से खाली हो चुकी है।विधानपरिषद की इस सीट को सपा से झटक कर भाजपा के प्रांशु दत्त द्विवेदी चुनाव जीते हैं।
 
अब से 30 साल पहले 1992 में अपने वजूद में आने के बाद तीन दशक तक समाजवादी पार्टी ने कन्नौज पर दबदबा बनाए रखा। लगातार मिली जीत से इसे सपा का गढ़ कहा जाने लगा था। इटावा का पड़ोसी जिला होने की वजह कर यह सपा मुखिया की कर्मभूमि भी रही और सियासी गलियारे में इसे खास रुतबा भी हासिल रहा। पिछले तीन दशक में लोकसभा और विधानसभा के कई चुनाव में जीत भी मिली। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। तीन दशक तक खुशबू के शहर पर हुकूमत पर करने वाली समाजवादी पार्टी अब यहां से पूरी तरह से साफ हो चुकी है। यहां कोई ऐसी सीट नहीं है, जिस पर सपा इतराए। भाजपा के बिछाए जाल में सपा की साइकिल यहां पूरी तरह से पंचर हो चुकी है।

लोकसभा चुनाव से सिमटना शुरू हुआ दायरा
सपा को अपने गढ़ में पिछले लोकसभा चुनाव 2019 से ही झटका लगना शुरू हो गया था। तब कन्नौज जैसी सबसे मजबूत मानी जाने वाली लोकसभा सीट पर डिंपल यादव की शिकस्त हो गई थी। पड़ोस की फर्रुखाबाद और इटावा पर भी भाजपा ने कब्जा बरकरार रखा था। उसके बाद पंचायत चुनाव में भाजपा ने अपना जोर दिखाया। विधानसभा चुनाव में 13 में से नौ सीटों पर भाजपा का कमल खिल गया। 

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