महिलाओं के लिए निराश्रित और बांझ जैसे शब्दों के उपयोग पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने मांगा जवाब

जयपुर
राजस्थान उच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार की सामाजिक सुरक्षा सहित अन्य योजनाओं में महिलाओं के लिए परित्याक्ता,निराश्रित और बांझ जैसे शब्दों के उपयोग पर सरकार से जवाब मांगा है। संविधान के तहत महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा और संरक्षण दिया जाना भी उनका अधिकार है। इसलिए न्यायालय सरकार को निर्देश दे कि वह सरकारी योजनाओं में महिलाओं के लिए सम्मानजनक शब्दों का उपयोग करे और वर्तमान में प्रचलित शब्दों पर रोक लगाई जाए । न्यायालय ने इस संबंध में राज्य सरकार की मुख्य सचिव ऊषा शर्मा के साथ ही राज्य महिला आयोग और महिला अधिकारिता विभाग से 27 जुलाई तक जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश एस.एस.शिंदे और जस्टिस अनूप ढंड की खंडपीठ ने अधिवक्ता कुणाल रावत की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जवाब मांगा है।

याचिका में कहा गया कि सरकार की योजनाओं में बांझ, परित्याक्ता और निराश्रित जैसे शब्दों का उपयोग किया जा रहा है। जबकि इन शब्दों का उपयोग करना संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है। संविधान के अनुच्छेद 51एई में महिलाओं के लिए सम्मानजनक शब्दों का उपयोग करने का प्रावधान है। इसमें कहा कि महिलाओं का सम्मान और गरीमा बनाई रखी जाए। उनके लिए ऐसे भद्दे शब्दों से संबोधित नहीं करें जो उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाते हो। लेकिन प्रदेश सरकार की योजनाओं से जुड़े दस्तावेजों में ऐसे शब्दों का उपयोग किया जा रहा है।

संविधान के तहत महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा और संरक्षण दिया जाना भी उनका अधिकार है। इसलिए न्यायालय सरकार को निर्देश दे कि वह सरकारी योजनाओं में महिलाओं के लिए सम्मानजनक शब्दों का उपयोग करे और वर्तमान में प्रचलित शब्दों पर रोक लगाई जाए। न्यायालय ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई की थी।न्यायालय ने इस संबंध में राज्य सरकार की मुख्य सचिव ऊषा शर्मा के साथ ही राज्य महिला आयोग और महिला अधिकारिता विभाग से 27 जुलाई तक जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश एस.एस.शिंदे और जस्टिस अनूप ढंड की खंडपीठ ने अधिवक्ता कुणाल रावत की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जवाब मांगा है।

 

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